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Thursday, 20 October 2016

रहस्यमयी हिमालय 11

वह व्यक्ति योगी बाबा अभेदानन्द की ओर उन्मुख हुआ | उसने बाबा से पूछा |
“ बाबा हम पूर्व जन्म से इस जन्म में आते कैसे है जबकि हमारा शरीर तो समाप्त हो चूका होता है |”
योगी बाबा ने प्रेम से समझाते हुए कहा “ हमारा स्थूल शरीर जो इस आँख से दिखाई देता है वह तो मर जाता है किन्तु हमारा  सूक्ष्म शरीर नहीं मरता और हमारा मन इसी सूक्ष्म शरीर के माध्यम से एक शरीर से दुसरे शरीर की यात्रा करता रहता है | मन हमारे संस्कारों का वाहक बनता है | आत्मा अमर है क्योंकि यह परमात्मा का हीं अंश है , इस आत्मा के उपर कई आवरण होते हैं | आत्मा के उपर दृश्य आवरण तो हमारा , रक्त मांस मज्जा , अस्थि  चमड़े से निर्मित शरीर है | आत्मा के और भी कई आवरण हैं जो अनुभव में आते हैं | हमारा मन भी आत्मा का आवरण हीं है | इस प्रकार बुद्धि , ज्ञान , आनन्द  अहंकार आदि आत्मा के उपर अदृश्य  आवरण  होते हैं | कई बार हम ये सोचते हैं मैं हूँ यह मैं अहंकार रूपी  आवरण है |
“ भगवन यह सूक्ष्म शरीर क्या है |” उसने बाबा से पूछा
योगी अभेदानन्द ने आँखें बंद की और हाथ हवा में लहराया | उनके हाथों में कुछ अनाज के  दाने थे | उन्होंने उसे दिखाते हुए पूछा “ यह क्या है |”
“बाबा यह तो गेंहू के दाने हैं |”
बाबा ने उसके सर पर हल्की चपत लगाईं और कहा  “ अब देख क्या है |”
उसने आश्चर्य से भरते हुए कहा “ बाबा गेंहूँ के चारो तरफ तो रंग विरंगे प्रकाश की किरणें नजर आ रहीं हैं |”
योगी  बाबा ने फिर से हाथ हवा में लहराया इस बार अनेकों किस्म के अनाज के दाने उनके हाथों में थे | उन्होंने उसे दिखाते हुए उससे पूछा  “ क्या नजर आता है |”
“ बाबा इन अनाज दानों के साथ झिलमिल करते हुए प्रकाश के किरण नजर आ रहें हैं |” उसने कहा
“ तुम्हारा , हमारा सभी का शरीर इन अन्न से बने हुएं हैं इसलिए कहा गया है अन्नं ब्रह्मा | हमारा  तुम्हारा जो शरीर है यह अन्न से बना हुआ है | अन्न से वीर्य और रज बने होते हैं जिससे  इस शरीर का निर्माण होता है | इस अन्न से  बने हुएस्थूल  शरीर को अन्नमय कोश कहते हैं | इस  अन्न से बने शरीर का महत्व यह है कि परमात्मा अनुभव में इसका अहम भूमिका  है | जिस प्रकार से नारियल के फल में अनेक आवरण होते हैं , ये आवरण कई भाग होते हैं जैसे छिलका , सख्त भाग उसके अंदर नारियल का गूदा और फिर उसके अंदर नारियल का पानी | ठीक उसी तरह ये शरीर जो अन्न से बना है बाहरी छिलका और सख्त खोपडा समझो इसे नारियल का | इसके अंदर फिर मन का कोश है , प्राण का  कोश है , विज्ञान का कोश जो की आत्मा है और उस आत्म तत्व की प्राप्ति का आनन्द हीं आनन्दमय  कोश है | अगर बाहरी छिलका और सख्त भाग न हो तो नारियल की कल्पना कर सकते हो क्या तुम ठीक उसी तरह शरीर का भी कार्य है |” बाबा ने समझाते हुए कहा |
“  मृत्यु के बाद तो तुम्हारा शरीर यहीं रह जाता है किन्तु सूक्ष्म शरीर जो अन्नमय शरीर का हीं सूक्ष्म रूप है नष्ट नहीं होता | यह सूक्ष्म शरीर अन्न के उस भाग से बना हुआ है जो तुमने प्रकाश रूप में देखा | अन्न के बनने की भी जटिल क्रिया है यह अन्न भी  पृथ्वी , प्रकाश ( अग्नि ) , जल , वायु और आकाश से हीं बना हुआ है | सूक्ष्म शरीर में इन्हीं दो तत्वों  प्रकाश (अग्नि ) और आकाश की मात्रा प्रबल होती है बाकी तीन तत्वों की मात्रा अत्यंत अत्यंत सूक्ष्म होती है | इन्हीं सूक्ष्मतम तत्वों के कारण सूक्ष्म शरीर जो मृत शरीर से निकला होता है कभी कभी लोगों को प्रेत रूप में दृश्य हो जाता है और कई बार इनकी आवाज़ भी सुनाई दे जाती है | इन्हीं तत्वों के माध्यम से आत्मा मन के साथ दुसरे शरीर में प्रवेश करता है | सूक्ष्म शरीर का आकार भी स्थूल शरीर के जितना हीं होता है और अदृश्य होता है | बिना साधना के इसे देखा और अनुभव नहीं किया जा सकता | सनातन धर्म  में शरीर को अग्नि में समर्पित करने का  कारण है प्रथम तो अग्नि स्थूल शरीर को जला कर नष्ट कर देती है और सूक्ष्म तत्व को मुक्त कर देती है अगली यात्रा हेतु | सूक्ष्म शरीर को परिभाषित करना हो तो हम कह सकते हैं कि सूक्ष्म शरीर मन , प्रकाश , आकाश वायु और आत्मा का जोड़ है | फिर भी इस तरह यह  पूर्णतया  परिभाषित नहीं होता यह अनुभव से हीं समझा जा सकता है | 

 इस ज्ञान के द्वारा वह व्यक्ति एक अलग हीं आयाम में छलांग लगा  चूका था |

रहस्यमयी हिमालय - 10

नौजवान साधक सच्चिदानन्द  ने गुफा में प्रवेश कर अपना स्थान ग्रहण कर लिया |
योगी बाबा ने सच्चिदानन्द को संबोंधित करते हुए कहा “ सच्चिदानन्द मैं देख रहा हूँ तुम अपने साधना में शत प्रतिशत नहीं दे रहे हो |”
“जी बाबा मैं अपना शत प्रतिशत लगाता हूँ किन्तु कुछ परेशानियों की अनुभूति मुझे हो रही है |” नौजवान साधक ने कहा
“ मैं तुम्हारी परेशानी देख रहा हूँ | साधना के समय कुछ पूर्व जन्म की स्मृतियाँ जीवित हो आती हैं और तुम विह्वल हो जाते हो |” योगी बाबा ने कहा
“ जी प्रभु जब भी मैं अपनी साधना की गहराईओं में उतरता हूँ कुछ दृश्य सजीव हो आते हैं बिलकुल नये दृश्य जिसका मेरे इस जीवन से कोई सम्बन्ध नहीं |” नौजवान साधक ने अपनी बात बताई
“ देखो जो दृश्य उत्पन्न होते हैं और तुम्हें परेशान करते हैं वे कभी पूर्वजन्म में तुम्हारे साथ घटित हो चुके हैं | तुम अपने मन के माध्यम से उन स्मृतियों को इस जन्म में भी ले  आये |” बाबा ने कहते हुए नौजवान साधक के सर को स्पर्श किया |
योगी  बाबा के स्पर्श से वह नौजवान साधक अपने पूर्वजन्म में पहुँच गया और कुछ दृश्य उसके सामने उपस्थित हुए |
उसने देखा चार पांच लोग उसे लाठी डंडा से पिट रहे हैं कुछ लोगों के हाथ में धारदार हथियार भी था | बहुत हीं बेरहमी से उसे लोग पिट रहे थे | वह मौका देख कर उठ कर भागा | लोग उसके पीछे पीछे हथियारों के साथ  |  वह बहुत हीं तेजी से भाग रहा था | भागते भागते बुरी तरह हांफ रहा था | वह थक कर चूर हो गया था | तभी भागने के क्रम में वह निचे गिर गया | पीछे से पीछा करते हुए लोग उसके पास पहुँच गयें और हथियार आदि से उस पर वार करना शुरू कर दिया |
नौजवान साधक यह दृश्य देख कर बुरी तरह चौक कर ध्यान से जागा |
बाबा उसकी तरफ देख कर मुस्करा रहे थे |
उसने बाबा से पूछा “यह क्या था ?”
बाबा ने कहा “ तुम्हारा पूर्वजन्म | जानते हो वे लोग कौन थे और  तुम्हें क्यों पिट रहे थे |”
नौजवान साधक ने कहा “ नहीं |”
वे लोग पूर्वजन्म के  तुम्हारे हीं सगे सम्बन्धी थे जमीन  के एक विवाद के कारण तुम्हें उनके क्रोध का सामना करना पड़ा और उन लोगों ने  तुम्हारी हत्या कर दी और तुम्हारे जमीन पर कब्जा कर लिया |” योगी  बाबा ने समझाते हुए कहा |
“उस पूरी भीड़ में से एक प्रमुख व्यक्ति के उपर तुम्हारी हत्या के अपराध में मुकदमा चला और फांसी हुई | शेष लोगों को जेल की सजा भी हुई |” योगी बाबा ने कहते हुए फिर से उसके सर का स्पर्श किया और वह पुन : ध्यानस्थ हुआ |
मृत्यु के बाद का सारा दृश्य उसके आँखों के सामने से गुजर गया न्यायलय का दृश्य , उन लोगों के सजा का दृश्य , फांसी का दृश्य सभी |
योगी बाबा ने उसे हिलाते हुए ध्यान से जगाया और कहा “ अभी तुम्हारे साधना की बाधा यह थी की तुम्हारा मन दोषियों पर अटका हुआ था की उनका क्या हुआ इसलिए तुम साधना में बार बार चौक जाते थे | अब तुमने ये जान लिया है इसलिए साधना के तुम्हारे मार्ग में कोई बाधा नहीं आएगी | मन जन्मों जन्मों में  जिस कारण में   अटका रहता है उन्हीं कामनाओं की पूर्ति हेतु पुनर्जन्म करवाता है | तुम्हारा कारण था अपने हत्यारों  का परिणाम जानना जो की तुमने जान लिया है | तुम्हारी बाधा समाप्त हुई |”

नौजवान साधक सच्चिदानन्द बाबा के चरणों में गिर पड़ा |

Thursday, 9 June 2016

Manipura chakra 2 मणिपुर चक्र 2

       बौद्ध तथा अनेक तांत्रिक परम्पराओं में कुण्डलिनी का वास्तविक जागरण मणिपुर चक्र से हीं माना जाता है न कि मूलाधार से |कई तांत्रिक परम्पराओं में मूलाधार तथा स्वाधिष्ठान की चर्चा तक नहीं की गयी है | क्योंकि उनके अनुसार ये चक्र पशु जीवन के उच्च स्तरों से सम्बन्धित है | मतलब हुआ पशु जीवन में चक्र  जागरण  का सबसे ऊँचा स्तर स्वाधिष्ठान चक्र है , पशुओं के लिए सहस्त्रार जागरण दुर्लभ है | यहीं इसी बात से  मानव जीवन और मानवीय शरीर की महता सिद्ध होती है | और हमें समझ में आता है कि  मानवीय शरीर क्यों आवश्यक है | तो प्रथम जागरण का केंद्र मणिपुर हीं है ऐसा इसलिए कि इस चक्र के जागरण के बाद अधोगामी होने की संभावना नहीं रहती | यहाँ तक जिस किसी भी साधक का चक्र जागृत हो गया हो तो उसके बाद अब कुण्डलिनी निचे नहीं गिर सकती | जबकि स्वाधिष्ठान तक पहुँच कर कुण्डलिनी के फिर से निचे गिरने की संभावना रहती है | 

मणिपुर तक जागरण पहुँचने के बाद जागरण सुनिश्चित होता है | मणिपुर में सजगता को स्थिर रखना तथा जागरण को जारी रखना थोडा कठिन होता है | इसलिए साधक को यहाँ पहुँच कर साधक को अपने प्रयास में लगनशील होना तथा दृढप्रतिज्ञ होना आवश्यक है | यदि सांसारिक कार्यों को करते हुए भी आपका जीवन अध्यात्मिक है , आप वगैर किसी संकोच के रूचि लेते हुए योगाभ्यास और ध्यान करते हैं | और उच्चतर जीवन के प्राप्ति हेतु गहरी प्यास है और इसके लिए गुरु की तलाश कर रहें हैं तो अब आपकी कुण्डलिनी मूलाधार में नहीं है | बल्कि वह एक उच्च केंद्र मणिपुर तक पहुँच गयी है |
       आगे जारी .................
ध्यान करते रहें अपने नित्य दैनिक के कर्मों में से सिर्फ  पैंतालिस मिनट , एक घंटा निकाल कर आप ध्यान करते हैं तो आपको स्वाद आने लगेगा , रस मिलने लगेगा अध्यात्म का | और स्वाद आने भर की देर है फिर उसके बाद तो बाकी कार्य परमात्मा सम्पन्न करेगा | ॐ के जाप से ध्यान का रस मिलना प्रारम्भ हो जाता है |

ॐ 

Tuesday, 7 June 2016

Manipura chakra मणिपुर चक्र

मणिपुर दो शब्दों से बना है मणि और पुर मतलब हुआ मणियों का नगर | तिब्बत के परम्परा में इसे मणिपद्म भी कहते हैं जिसका अर्थ हुआ मणियों का कमल | मणिपुर सक्रियता , शक्ति ,इच्छा तथा उपलब्धियों का केंद्र है | इसकी तुलना सूर्य के तेज गर्मी व् शक्ति से की जाती है जिसके अभाव में इस धरा पर जीवन की कल्पना संभव नहीं | ठीक उसी तरह मणिपुर चक्र भी विभिन्न अवयवों , संस्थानों तथा जीवन की प्रक्रियाओं को नियमित करते तथा शक्ति प्रदान करते हुए सम्पूर्ण शरीर में प्राण उर्जा के प्रवाह का जिम्मेदार है | 

शक्ति की कमी होने पर यह चक्र एक शक्तिशाली ज्वाला की भाँती न हो कर दहकते हुए एक लाल अंगार की तरह हो जाता है | ऐसी स्थिति में व्यक्ति निष्क्रिय व् शक्तिहीन होता जाता है | ऐसा व्यक्ति व्याधियों व् अवसाद से ग्रस्त हो जाता तथा उसमे प्रेरणा की कमी एवं उतरदायित्वों के प्रति लापरवाही देखने को मिलती है | इसलिए मणिपुर का जागरण न केवल साधक के लिए एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है वरन उनके लिए भी आवश्यक है जो जीवन के सम्पूर्ण आनन्द की अनुभूति हेतु उत्सुक  है |
       कुण्डलिनी का मूल निवास मूलाधार , घर स्वधिस्थान और प्रथम जागरण का केंद्र मणिपुर है |

ॐ सत्यं परम धिमहि !
खूब  ध्यान  कीजिये  ध्यान  करने  से  कोई  हानि  नहीं  होती  बिना  भयभीत  हुए  ध्यान  करें  अगर  गुरु नहीं  हैं  तो  परमात्मा  का हाथ  आपके  उपर  है  इस  भाव  को  दृढ कर के  ध्यान  में  बैठे | परमात्मा  के  लिए  ध्यान  में  आंसू  बहायें  | अच्छा  संगीत  सुनें instrumental बांसुरी  , सितार , जलतरंग , संतूर  आदि |

आगे जारी .................

Saturday, 4 June 2016

How to calm mind during meditation. ध्यान के दरम्यान मन शांत कैसे करें

मन  बहुत  चंचल है | जब  ध्यान  करने  बैठो उसी वक्त यह ज्यादा परेशान करता  है शांत हीं नहीं होता |  इसका  ईलाज है  कारगार  ईलाज  ! आखिर मन  के उपर  भी  उसका  बाप  आत्मा जो  बैठा  है  ईलाज  कैसे नहीं  मिलेगा  | ऐसे में अधिकाँश साधक आत्म सुझाव ( Auto suggestion ) का सहारा लेते हैं | जैसे की मन  हीं मन वे  दुहराते हैं ” मेरा मन  शांत हो  रहा  है .............मेरा मन  शांत  हो  रहा  है ........|” लेकिन कई बार  यह भी कार्य  नहीं करता तब क्या करें ? ऐसे में एक रामबाण ईलाज है !
शान्ति  से सुखासन में बैठ  जाएँ |
रीढ़ की हड्डी  सीधी  तनी हुई नहीं |

तीन बार  अनुलोम  विलोम प्राणायाम  कर  लें ( नहीं भी करेंगे तो चलेगा )
अब एक  गहरी  लम्बी सांस अंदर खींचते हुए ॐ ................का उच्चारण करें साँसों को छोड़ते हुए |
फिर  एक  बार ॐ .............................
ॐ  का उच्चारण करते रहें |
आपके ॐ के उच्चारण  से शरीर में स्पंदन होने लगेगा |
इस  स्पंदन को मह्शूश करें |
ॐ का उच्चारण सिर्फ मुंह से नहीं हृदय से करें |
अपने अहं को ॐ में विलीन कर दें |
शरीर और मन में ॐ के प्रकम्पन को मह्हूश करें |
आप  देखेंगे आपका मन  शांत  हो  गया है |

ॐ ॐ ॐ 

Thursday, 2 June 2016

swadhisthana chakra 4 स्वाधिष्ठान चक्र – 4

स्वाधिष्ठान का सम्बन्ध स्थूल शरीर में प्रजनन तथा मूल संस्थान से है , परन्तु शारीरिक रूप से यह प्रोटेस्टेंट के स्नायुओं से सम्बन्धित है | स्वाधिष्ठान चक्र रीढ़ के हड्डी के निचे काक्सिस के स्तर पर स्थित है | यह हड्डियों के एक छोटे बल्ब की तरह है जो गुदाद्वार के ठीक उपर है | शरीर क्रियाविज्ञान के दृष्टिकोण से यह पुरुषों और स्त्रियों दोनों के मूलाधार चक्र के अत्यंत नजदीक है |
स्वाधिष्ठान का रंग काला है क्योंकि यह मूल अज्ञान का प्रतीक है | किन्तु पारम्परिक रूप से इसे छ : पंखुड़ियों के सिंदूरी कमल के रूप में चित्रित किया जाता है | हर पंखुड़ी पर बं , भं ,मं , यं ,रं और लं चमकीले रंगों में अंकित है | इस चक्र का तत्व जल है जिसका प्रतीक है – कमल के अंदर एक सफ़ेद अर्ध चन्द्र | यह अर्ध चन्द्र दो वृतों से मिल कर बना है जिनसे दो यंत्रों की संरचना होती है | बड़े वृत्त से बाहर की और पंखुडियां निकलती हुई दिखाई देती है जो भोतिक चेतना का प्रतीक है | अर्ध चन्द्र के अंदर वाले छोटे वृत में उसी  प्रकार की पंखुडियां हैं पर वे केंद्र की और मुड़ी हुई हैं | यह अकार विभिन्न कर्मो  के भंडार गृह का प्रतीक है | 

अर्ध चन्द्र के अंदर इन दो यंत्रों को सफ़ेद रंग का एक मगर अलग अलग करता है | यह मगर अचेतन जीवन की सम्पूर्ण मनोलीला का माध्यम है अर्थात सुप्त कर्मों का प्रतीक है | मगर के उपर स्वाधिष्ठान चक्र का बीज मन्त्र ‘ वं ’ अंकित है |
       मंत्र के बिंदु के अंदर देव विष्णु और देवी राकिनी का निवास है | विष्णु के चार हाथ हैं और उनका रंग चमकीला है | उनके वस्त्र पीले एवं अत्यंत हीं सुंदर हैं | राकिनी का रंग नीले कमल की तरह है एवं वे दिव्य वस्त्र एवं आभूषणों से सजी हुईं हैं | अपने उपर उठे हाथों में उन्होंने अनेक शस्त्र धारण कर रखें हैं | अमृतपान करने से उनका मन  आनन्दित है | वे वनस्पतियों की देवी हैं | स्वाधिष्ठान चक्र का सम्बन्ध वनस्पतियों से है | अत : कुण्डलिनी  के साधक को निरामिष हीं रहना चाहिए |
       स्वाधिष्ठान का लोक भुव: है जो अध्यात्मिक जागृति का मध्य स्तर है | इस चक्र से स्वाद की तन्मात्रा या संवेदना सम्बन्धित है | ज्ञानेन्द्रियाँ जिह्वा , कर्मेन्द्रियाँ यौन अवयव ,किडनी तथा मूत्र संस्थान हैं | स्वाधिष्ठान की मुख्य वायु व्यान है जो पुरे शरीर में स्थित है | स्वाधिष्ठान और मणिपुर चक्र प्राणमय कोष के निवास स्थान हैं |

       स्वाधिष्ठान पर ध्यान लगाते रहने से मनुष्य अपनी आंतरिक दुष्प्रवृतियों जैसे काम , क्रोध , लोभ आदि से तुरंत मुक्त होने लगता है | उसकी वाणी अमृत की तरह तथा काव्यमय एवं ज्ञानयुक्त होती है | 

Tuesday, 31 May 2016

स्वाधिष्ठान चक्र 3

स्वाधिष्ठान को व्यक्ति के अस्तित्व का अधार माना गया है | मष्तिष्क में इसका रूप अचेतन मन है ,जो संस्कारों का भंडारगृह भी है | ऐसा कहा जाता है कि प्रत्येक कर्म , पिछला जन्म , पिछले अनुभव , मानव व्यक्तित्व  का सबसे बड़ा पक्ष अचेतन सभी का प्रतीक स्वाधिष्ठान चक्र को माना जाता है | अचेतन मन संस्कारों का जमा होने का केंद्र है | तथा यही इस चक्र के स्तर पर अनुभव की जानेवाली अनेक नैसर्गिक अनुभूतियों का उद्गम भी है |

       तन्त्र में पशु तथा पशु का नियन्त्रण जैसी एक धारणा है | संस्कृत में पशु का अर्थ है जानवर और पति का मतलब है नियंत्रक | पशुपति का अर्थ है – सभी पाशविक प्रवृतियों का नियन्त्रणकर्ता | यह भगवान शिव का एक नाम तथा स्वाधिष्ठान चक्र का एक गुण भी है | पौराणिक मान्यता के अनुसार पशुपति पूर्णत: अचेतन हैं | मानव विकास के प्रथम स्तर पर यह मूलाधार चक्र तथा पाशविक प्रवृतियों का नियन्त्रणकर्ता है |
जब शक्ति स्वाधिष्ठान चक्र में प्रवेश करती है तो हमारे अचेतन स्थिति का एक शक्तिशाली अनुभव होता है | मतलब अचेतन की चीजें उभर उभर कर सामने आने लगती हैं | अचेतन मन में संसार और कर्म बीज रूप में सुप्त पड़े रहते हैं |

आगे जारी है .....

स्वाधिष्ठान चक्र 2

आगे .................
कुण्डलिन के स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित होने पर सभी अवशेष कार्य और नकारत्मक संस्कार अभिव्यक्ति के माध्यम से बाहर निकल जाते हैं | इस समय क्रोध , डर , यौन विकृतियाँ तथा अनेक प्रकार की इच्छाएं प्रकट हो सकती है सभी प्रकार की तामसिक वृतियां तन्द्रा . अकर्मण्यता तथा निराशा आदि का प्रकटीकरण भी संभव है व्यक्ति आलसीपन का शिकार हो सकता है बहुत ज्यादा निद्रा से ग्रसित हो सकता है ( किन्तु इसका मतलब ये नहीं की आलसी और ज्यादा सोने वालों का स्वाधिष्ठान  चक्र जाग गया है ) | ऐसे समय में  विचलित होने की बात नहीं है | ऐसा समय  जब आवे तब मात्र साक्षी हो कर अपने भीतर के दुर्गुणों को देखना चाहिए कर्ता नहीं बनना चाहिए | इसलिए समय समय पर मैं ध्यान प्रयोग करने को कहता हूँ और तरह तरह का ध्यान विडियो के माध्यम से भी प्रेषित  करता रहता हूँ | खैर ..... प्रत्येक साधक व  संत को इस विशिष्ट अनुभूति के स्तर को जो  जीवन के रहस्यों के अंतिम विस्फोट की भाँती होता है इसे पार करना हीं पड़ता है | 

गुरु की कृपा , संकल्प शक्ति , अध्यात्मिक मार्ग में लगनशीलता , लक्ष्य के प्रति सजगता व  शोधक अनुभूतियों को ठीक से समझ कर  इस मार्ग की समस्याओं को झेला जा सकता है | और असावधानी होने पर डरने की बात नहीं सिर्फ होगा ये की कुण्डलिनी शक्ति फिर से मूलाधार चक्र पर आ जायेगी गिर कर | ऐसे स्थित में वैराग्य भाव बहुत मदद करता है | जैसे मन में संकल्प चलना चाहिए की आज तक भोगों को भोग कर तुमने क्या पाया और निष्कर्ष मन दिखा देता है की कुछ भी नहीं | इसलिए ऐसी  स्थिति में  तीव्र वासना का तूफ़ान जब आये तब वैराग्य भाव को मजबूत करें |
पुन : चर्चा होगी
ध्यान के विडियो के लिए यूट्यूब  लिंक 

स्वाधिष्ठान चक्र

स्वाधिष्ठान चक्र 
संस्कृत में स्व का अर्थ होता है अपना और अधिष्ठान का अर्थ होता है रहने का स्थान | स्वाधिष्ठान का शाब्दिक अर्थ हुआ अपने रहने का स्थान | मूलाधार के ठीक उपर का चक्र स्वाधिष्ठान चक्र है | कुछ कुण्डलिनी विद्वानों का मानना है कि पहले कुण्डलिनी स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित थी किन्तु बाद में मूलाधार में गिर गयी | प्राचीन काल सतयुग , त्रेता और द्वापर युगों के मनुष्यों की कुण्डलिनी स्वाधिष्ठान में थी | अब इसमें कितनी सच्चाई है ये पता नहीं किन्तु इस चक्र का नाम तो कुछ ऐसा हीं संकेत देता है | तो एक मान्यता यह भी है कि अगर कुण्डलिनी स्वाधिष्ठान पर पहुँच गयी हो तो पुन : मूलाधार पर भी आ सकती है | दैनिक जीवन और साधना में एकाएक खूब आनन्द और फिर दुःख का यह भी एक कारण है | देखो तुम साधना करो न करो किन्तु कुण्डलिनी तुम्हारे नित्य जीवन में अपने अनुभव देती रहती है जरूरत है जागरूक होने का | संगीत में तुम खूब तल्लीन हो सारा सुध बुध खो चुके हो तो उस घड़ी तक कुण्डलिनी मूलाधार पर फन उठा कर ( सजग हो कर ) कर स्वाधिष्ठान की ओर देख रही होती है और परिणाम आनन्द | अपने दैनिक जीवन में सजग होने पर ये अनुभूतियाँ मह्शूश की जा सकती है | अब कुछ अच्छे वक्ता है जिनको सुन कर जनता मुग्ध हो जाती है उस वक्त वक्ता का विशुद्धि चक्र सजग होने लगता है , ध्यान रहे स्वाधिष्ठान चक्र जाग नहीं जाता सिर्फ थोडा सजग होता है |
आगे इस पर और बातें करूँगा

ध्यान निर्देश के लिए यूट्यूब विडियो लिंक 

Sunday, 22 November 2015

ध्यान क्या है अपने भीतर प्रवेश करना |

बाहर  के जगत से तो हम परिचित  हैं हीं | अपना स्वभाव हीं ऐसा है कि सिर्फ और सिर्फ बाहर हीं विचरण करते रहते हैं हम सभी | अस्सी प्रतिशत बाहरी जगत से हम आँख के द्वारा परिचित होते हैं | यानी अधिकाँश आकर्षण आँख के द्वारा हीं पैदा होता है | इसलिए ध्यान करने के पहले हमें आँख बंद करना होता है | तब भीतर का जगत दीखता है थोडा सा | थोडा सा इसलिए क्योंकि फिर कल्पनाएँ हावी होने लगती है खुद पर | आँख बंद हुआ नहीं की कल्पना का घोडा दौड़ना शुरू | कभी भविष्य का  ख्याली पुलाव पकाते हुए तो कभी अतित को   याद करते हुए | मन स्थिर होता हीं नहीं स्वभाव हीं इसका ऐसा है स्थिर होगा भी कैसे | तो कोई युक्ति लगानी होगी और हम कह सकते हैं यह युक्ति है ध्यान | ध्यान में मन को शरीर के भीतर भ्रमण करने का छूट दिया जाता है | 

कभी साँसों पर ध्यान केन्द्रित करना होता है तो कभी हृदय की धडकन पर | ध्यान में शरीर के भीतर हो रहे  रक्त संचरण को भी सुना जा सकता है | तो मन शरीर में हो रही संवेदनाओं के प्रति सजग होने लगता है और रहस्य खुलने लगते हैं | एक से एक कौतुक दिखते हैं बंद आँखों से शरीर के भीतर किन्तु हम तो कभी शरीर के भीतर जाते हीं नहीं सिर्फ बाहर विचरण करते रहते हैं |

       एक के बाद एक रहस्यों से पर्दा उठता जाता है शरीर के भीतर विचरण करने पर और अंतत: उसका दीदार होता है अरे भाई उसी का जो हम वास्तव में हैं परमात्मा कहें बड़े स्तर पर या आत्मा कहें छोटे स्तर पर ! 

ये  विडिओ  आपके  ध्यान लगाने  में सहयोगी होगा 

Friday, 6 November 2015

ईश्वर की खुमारी ( मूलाधार चक्र की यात्रा )

वह अपने हीं शरीर का अवलोकन कर स्तब्ध था | इसके पूर्व उसने अपने हीं शरीर की ऐसी यात्रा कभी नहीं की थी | वाह ईश्वर ! वाह ! अदभुत है तेरी कृति | मन हीं मन वह विचारने लगा |सम्पूर्ण शरीर में भाँती भाँती के अदभुत प्रकाश जिसे उसे अपनी बाहरी दुनिया में कभी नहीं देखा था सभी दिखाई दे रहे थे | उसने तो शरीर में सात चक्रों के बारे में  सुन रखा था यहाँ तो शरीर के भीतर सर से पाँव तक अनेकों अनेक चक्र दिखाई दे रहे थे उसे |
वह स्तब्ध हो कर मनीषी से पूछा -  “ यहाँ तो अनेकों चक्र हैं शरीर के भीतर |”
-    “ हाँ |”  मनीषी ने जबाब दिया
-    “ दरअसल यही सारे चक्र मनुष्यों के शरीर का संचालन करते हैं दिव्य ईश्वरीय तरंगो के द्वारा | सूर्य का प्रकाश भी इसमें सहायक है | ये चक्र पृथ्वी पर मौजूद प्रत्येक प्राणियों में स्थित है यहाँ तक की पेड़ पौधों में भी | तुम्हें क्या लगता है कि तुम सिर्फ भोजन ,जल एवं वायु से हीं जीवित हो ” मनीषी ने कहा |
-    “अच्छा इधर आओ यहाँ देखो जनेंन्द्रिय से थोडा पीछे रीढ़ की अंतिम हड्डी से थोडा आगे दोनों के मध्य में क्या दिखाई देता है ? मनीषी ने पूछा |
वह गौर से उस ओर देखने लगा जहाँ मनीषी ने निर्देशित किया था
-    “अदभुत ! अदभुत ! यहाँ तो अदभुत सुगंध व्याप्त है जैसा की बाह्य जगत में  नहीं |” उसके मन में गूँज उठा
-    “यहाँ तो पीले प्रकाश की अदभुत छटा है और दिव्य सुगंध भी  |” उसने कहा
-    “प्रकाश के पार देखो | अपने दृष्टि और सूक्ष्म करो |” मनीषी ने कहा |  
-    “ओह्ह हो ! यहाँ तो मुझे कमल की चार पंखुडियां नजर आ रही है जो की बाहरी जगत में दिखने वाले लाल रंग सी प्रतीत हो रहीं हैं फिर भी रंगों की कोई तुलना भी की जा सकती  | ” उसने कहा |
-    “दृष्टि को और सूक्ष्म करो |” मनीषी ने निर्देश दिया और उसका हाथ अपने हाथों में पकड लिया | हाथ मनीषी के हाथ में आते हीं उसकी दृष्टि और खुल गयी |
-    “अह्ह्ह ! अदभुत ! मेरे भगवन ! इन प्रत्येक  पंखुड़ियों पर तो एक एक अक्षर खुदे हुए हैं जिनका रंग अदभुत सुनहला है |” उसने कहा
-    “निरिक्षण करते जाओ |” मनीषी ने आदेशात्मक लहजे में कहा |

-    “अरे ये क्या यहाँ तो एक वर्गाकार आकृति है इसका रंग पिला है | पिला प्रकाश तो यहीं से फूट रहा है | इस पीले प्रकाश , वर्ग , और कमल के चार पंखुड़ियों का क्या रहस्य है भगवन ! यह क्या है |”
-    “ तुम जहाँ स्थित हो इस वक्त यह मूलाधार चक्र है | इस चक्र का तत्व पृथ्वी है इसलिए यहाँ पीले रंग की प्रधानता हैऔर सुगंध बिद्यमान है  | इस चक्र की  तन्मात्रा गंध है | दरअसल यहाँ की  प्रधान तन्मात्रा गंध है | पृथ्वी तत्व में और तन्मात्राओं की भी विशेषता होती है जैसे  रूप , रस , स्पर्श , शब्द |  और उपर यात्रा करने पर ये भी दृश्य होंगे | प्रधान तन्मात्रा गंध होने के कारण तुम्हें सुगंध मह्शूश हुआ | मानव मूलाधार चक्र के स्तर पर हीं जीता है | इसलिए इस चक्र के गुण उसे खींचते हैं | पाँचों तन्मात्राएँ सक्रीय होने के कारण मनुष्य इन तन्मात्राओं के गुण की ओर आकर्षित होता है | अर्थात गंध , रूप , रस , स्पर्श  तथा शब्द से मनुष्य आकर्षित होता है और काम (वासना ) का निर्माण होता है मनुष्यों में |प्रत्येक इन्द्रिय एक एक तन्मात्राओं से जुडी हुईं हैं | बाह्य जगत से ये चक्र हीं  अपने स्वभावनुसार गुणों को खींचकर इन्द्रियाँ के माध्यम से मनुष्य में उथल पुथल मचाते हैं(मनीषी के चेहरे पर मुस्कुराहट थी) ऐसा इसलिए क्योंकि ये चक्र जागृत नहीं हैं |
-    “जागृत नहीं हैं तो फिर ये कार्य कैसे कर रहें हैं जैसा आपने बताया |” उसने प्रश्न  दागा |
-    “ कहने का तात्पर्य ये है कि ये चक्र अपने स्वाभाविक अवस्था में कार्य कर रहें है जागृत या अधिक उर्जावान हो कर नहीं |”
-    “ क्या वर्ग की आकृति वैसी हीं है जैसा तुम बाह्य जगत में देखते हो |” मनीषी ने पूछा |
-    “ नहीं यह वर्ग तो अदभुत है इसके चारों कोनों पर भाले की नोक जैसी आकृति बनी हुई है | और वर्ग के चारो भुजाओं के मध्य में भी नुकीली आकृति दृश्यमान है नुकीली आकृति का रंग भी अदभुत सुहला है  |” उसने कहा |

मनीषी मन हीं मन मुस्कुराए और कहा – और आगे दृष्टिपात करो |
 जारी ........

ईश्वर की खुमारी - 2

गतांक से आगे ........
शाम ढलने को आई थी  वह ध्यान लगाने के लिए तत्पर था | कुश  आसन बिछा कर उस पर पद्मासन लगाये ध्यान को नासिकाग्र पर स्थिर करते हुए प्राणायाम का अभ्यास कर रहा था वह | किन्तु ध्यान लग नहीं रहा था | ख्याल में बार बार वही ऋषि जैसे दिखने वाले महात्मन का ख्याल आ जाता था | (पूरी कथा के लिए पढ़ें पिछला भाग ब्लॉग पर जा कर  )
लाख प्रयत्नों के वावजूद आज ध्यान नहीं लग रहा था | अंतत उठ कर उपरी मंजिल के  कमरे से होते हुए बालकनी में आया | वहां से गंगा की कल कल ध्वनी सुनाई दे रही थी  और बाहर का  वातावरण बिलकुल हीं मनमोहक लगने लगा उसे | आराम कुर्सी ( Rest Chair ) पर पीठ टिकाये न जाने किस क्षण उसकी आँख झपक गयी | ध्यान जैसी तन्द्रा अवस्था में पुन : उसके मन: क्षेत्र में उन महापुरुष का आगमन हो चुका था | लगा कुछ क्षण के लिए  हजारों वाट का बल्ब जल गया हो | किन्तु कुछ क्षणों में हीं पिला मद्धिम प्रकाश रह गया मन: क्षेत्र में | इस बार पीली रेशमी कुर्ते और पीली रेशमी धोती पहने नजर आये वे |

-    “किन ख्यालों में हो |” महात्मन ने पूछा
-    “नहीं मैं सोच रहा था आप कौन हैं |” उसने कहा
-    “समय आने पर सब बता दूंगा | मैं साफ़ देख रहा हूँ तुम्हारे भीतर आत्म ज्ञान तथा ब्रह्म ज्ञान पाने की आतुरता हिलोरें ले रहीं है | ” महात्मन ने कहा
-    “जी निसंदेह आप मेरे  मन: क्षेत्र में हैं और आपसे मेरे  मन की कोई बात नहीं छिपी हुई है |” उसने कहा
-    हूँन्न्न्न............ और वे मंद मंद मुस्काने लगे |
-    “अच्छा बताओ तो जरा मैं और तुम तुम्हारे खोपड़ी के जिस भाग में हैं उस क्षेत्र को क्या कहतें हैं |” उन्होंने पूछा |
-    “जी मेरी मति तो कहती है ये चिदाकाश है |” उसने कहा |
-    सत्य है ! चिदाकाश चित का आकाश जहाँ  एकाग्र होने पर चित यानी मन की गतिविधियाँ विचार आदि  दिखाई देने लगती है और तुम साक्षी बन जाते हो |” ऋषि जैसे दिखने वाले महापुरुष ने कहा |
-    “ जी |” उसने कहा 
-    “अच्छा आओ मेरे पीछे पीछे जरा तुम्हारे शरीर का भीतर से निरिक्षण करूँ |” महा पुरुष ने कहा
कुछ हीं क्षणों में सम्पूर्ण शरीर में भ्रमण के बाद दोनों शरीर के भीतर हीं एक बिंदु पर खड़े थे |
-    “क्या दिखाई देता है ?” महात्मन ने पूछा |
-    “जी  पाँव से सर के चोटी तक केवल भवंर ( चक्र ) हीं भंवर नजर आ रहे हैं | प्रतीत होता है इन भंवरों  से शक्ति बाहर निकल कर सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त हो रही है |” उसने अपने आज्ञा चक्र वाले चक्षु से देख कर कहा |
महापुरुष के चेहरे पर मंद मुस्कान उभर आयी


आगे जारी है .......

Sunday, 1 November 2015

शाम्भवी मुद्रा

शाम्भवी मुद्रा योगियों के मनोरथ पूर्ण करने वाली मुद्रा है। उन्नत योग साधकों को शाम्भवी मुद्रा स्वतः ही होने लगती है| फिर भी साधकों द्वारा इसका अभ्यास साधना को सुगम बना देता है|
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श्री श्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय और महावातार बाबाजी के चित्र शाम्भवी मुद्रा में ही हैं|
सारे उन्नत योगी शाम्भवी मुद्रा में ही ध्यानस्थ रहते हैं|
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सुखासन अथवा पद्मासन में बैठकर मेरुदंड को उन्नत रखते हुए साधक शिवनेत्र होकर अर्धोन्मीलित नेत्रों से भ्रूमध्य पर दृष्टी स्थिर रखता है| धीरे धीरे पूर्ण खेचरी या अर्ध-खेचरी भी स्वतः ही लग जाती है|

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आध्यात्मिक रूप से खेचरी का अर्थ है --- चेतना का सम्पूर्ण आकाश में विचरण, यानि चेतना का इस भौतिक देह में न होकर पूरी अनंतता में होना है | भौतिक रूप से खेचरी का अर्थ है -- जिह्वा को उलट कर भीतर प्रवेश कराकर ऊपर की ओर रखना| गहरी समाधि के लिए यह आवश्यक है| जो पूर्ण खेचरी नहीं कर सकते वे अर्धखेचरी कर सकते हैं जीभ को ऊपर पीछे की ओर मोडकर तालू से सटाकर रखते हुए|


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अर्धोन्मीलित नेत्रों को भ्रूमध्य में स्थिर रखकर साधक पहिले तो भ्रूमध्य में एक प्रकाश की कल्पना करता है और यह भाव करता है कि वह प्रकाश सम्पूर्ण ब्रह्मांड में फ़ैल गया है| फिर संहार बीज और सृष्टि बीज --- 'हं" 'सः' के साथ गुरु प्रदत्त विधि के साथ अजपा जप करता है और उस सर्वव्यापक ज्योति के साथ स्वयं को एकाकार करता है | समय आने पर गुरुकृपा से विद्युत् की चमक के समान देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होती है| उस ब्रह्मज्योति पर ध्यान करते करते प्रणव की ध्वनि सुनने लगती है तब साधक उसी में लय हो जाता है| सहत्रार की अनुभूति होने लगती है और बड़े दिव्य अनुभव होते हैं| पर साधक उन अनुभवों पर ध्यान न देकर पूर्ण भक्ति के साथ ज्योति ओर नाद रूप में परमात्मा में ही अपने अहं को विलय कर देता है| तब सारी प्राण चेतना आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य स्थिर हो जाती है| यही शाम्भवी मुद्रा की पूर्ण सिद्धि है

इस बेहतरीन पुस्तक को अवश्य पढ़ें ( English ) हिंदी में                                                                                                                                          
नोट  : बिना  योग्य  निर्देशन के खेचरी मुद्रा  करना  वर्जित  है | लेख में स्वत : खेचरी मुद्रा  लगने का वर्णन  है अगर  ऐसा  स्वत : हो  जाए  तो  कोई  बात  नहीं  |
तस्वीर में शाम्भवी तथा अघोरी  मुद्रा में अंतर दिखाया गया है शाम्भवी मुद्रा में आँख उपर की ओर भ्रूमध्य के तरफ और अघोरी मुद्रा में आँखें निचे की ओर नासिकाग्र के तरफ या निचे |

ॐ