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Tuesday, 16 May 2023

Why do we need to meditate

Meditation is a practice that has been valued for centuries and is gaining increasing recognition in the modern world for its numerous benefits. It involves training the mind to focus and redirect thoughts, leading to a state of heightened awareness and inner calm. The importance of meditation stems from its ability to positively impact various aspects of one's physical, mental, and emotional well-being.

One key benefit of meditation is its ability to reduce stress and promote relaxation. Through regular practice, individuals learn to quiet the mind and let go of racing thoughts, thus reducing anxiety and enhancing overall mental clarity. This practice has been shown to lower levels of the stress hormone cortisol, leading to improved immune function, better sleep, and a greater sense of well-being.





Another significant aspect of meditation is its impact on mental health. Studies have shown that meditation can help alleviate symptoms of depression and anxiety by promoting a more positive outlook, increasing self-awareness, and developing coping mechanisms for stress. It encourages individuals to observe their thoughts without judgment, creating a greater sense of emotional stability and resilience.

Furthermore, meditation can enhance cognitive function and focus. Regular practice has been associated with improved attention span, memory retention, and decision-making abilities. By training the mind to concentrate on a specific object or thought, meditation helps individuals develop mental clarity, creativity, and problem-solving skills.

In addition to its mental benefits, meditation also has positive effects on physical health. It has been found to reduce blood pressure, lower heart rate, and decrease the risk of cardiovascular diseases. Moreover, meditation can improve the immune system's functioning, leading to a stronger Défense against illness and disease.

Beyond the individual level, meditation has the potential to foster greater compassion and empathy. By cultivating a deeper understanding of oneself, individuals can develop a more empathetic attitude towards others, enhancing interpersonal relationships and promoting a sense of interconnectedness.

In summary, the importance of meditation lies in its ability to enhance overall well-being. By reducing stress, improving mental health, sharpening cognitive abilities, and promoting physical well-being, meditation offers a holistic approach to self-care. Incorporating this practice into daily life can lead to a greater sense of inner peace, balance, and resilience, ultimately contributing to a healthier and more fulfilling life.

  

Thursday, 27 September 2018

बहुत हीं शक्तिशाली ध्यान प्रयोग |


समस्त जीवन का आधार  क्या  है  ? पृथ्वी पर जीवन का आधार क्या है ?
विज्ञान कहता है समस्त पृथ्वी पर जीवन का आधार सूर्य है | सूर्य से हीं सारी  पृथ्वी तथा अन्य  अन्य  संचालित होते हैं यह सत्य है | फिलहाल हम विज्ञान की बात को हीं मानते  हैं | अध्यात्मिक जगत भी सूर्य को अत्यधिक महता देता है किन्तु समस्त जगत के कारण में अध्यात्म ईश्वरीय सता जिसे सनातन में ब्रह्म की उपमा दी गयी है उसे मानता है | समस्त जगत का कारण  ब्रह्म है जो सर्वत्र व्याप्त है | हालाकि विज्ञान भी इसे मानता है किन्तु अभी उहापोह की स्थिति है |


समस्त जीवन का कारण  सूर्य की रश्मियाँ हैं विज्ञान के अनुसार किन्तु सत्य इससे भी परे है खैर हम ध्यान पर आते हैं |
निचे वर्णित ध्यान प्रयोग भाव प्रधान है और  बहुत हीं शक्तिशाली है बहुत  हीं शक्तिशाली कहने से डरने की आवश्यकता  नहीं है इस ध्यान प्रयोग से नुक्सान कुछ भी होने  वाला नहीं है और लाभ यह तो आप कर के हीं देखें और बताएं | इस ध्यान को करने से समस्त रोगों में लाभ मिलेगा , अपनी ऊर्जा परम पर होगी , आत्मविश्वाश में गजब का फायदा मिलेगा | दिव्य ऊर्जा की अनुभूति होगी |
 लम्बे अभ्यास के बाद कई सिद्धियाँ भी प्रकट हो सकती हैं , यथा |

यह ध्यान किसी भी समय किया जा सकता है किन्तु सूर्योदय के पूर्व या सूर्योदय के समय करने पर अत्यधिक लाभ मिल सकता है |
प्रथम चरण
आराम से सुखासन में बैठ जाएँ | निचे कोई ऊनी , सूती  का आसन बिछा लें | रीढ़ की हड्डी सीधी कर लें तनी हुई नहीं |
आँखें बंद कर लें | दो चार लम्बी गहरी सांस लें और छोड़ दें | आहिस्ता आहिस्ता आराम से |
ध्यान को आज्ञा  चक्र पर लायें  | तीन से पांच मिनट तक |
अब ध्यान को  सर के चोटी पर ले जाएँ तीन से पांच मिनट तक ध्यान को सर के चोटी पर टिकाये  रखें |
अब सूर्य का ध्यान करें प्रकाश से युक्त सूर्य आपके सर पर चमक रहा है और सूर्य की रश्मियाँ ( किरणें ) आपके सर पर गिर रहीं हैं ऐसा भाव करें |
पन्द्रह से बीस मिनट तक ऐसा भाव करें |
दूसरा चरण
ध्यान को आज्ञा चक्र पर लायें तीन से पांच मिनट तक |
उसके बाद
ध्यान को नाभि ( मणिपुर चक्र ) के पास ले आयें |  दो मिनट तक ध्यान को नाभि पर टिकाने के बाद
कल्पना करें आपके नाभि क्षेत्र में एक उगते हुए  लाल सूर्य को देखें | इस उगते हुए लाल सूर्य से प्रकाश की किरणें निकल कर आपके सारे शरीर में फ़ैल रही है ऐसी कल्पना करें |
पन्द्रह से बीस मिनट तक ऐसी  कल्पना करें 
पुनः ध्यान को आज्ञा चक्र पर लायें दो से पांच मिनट तक |
इसके बाद आप ध्यान से निकल सकते हैं  |
यह प्रकाश की किरणें आपके सारे रोगों को दूर करेगी | आपमें आत्मविश्वाश को  बढ़ाएगी , आपमें आनन्द का संचार करेगी | और भी अनेकों लाभ पहुंचाएगी |
ॐ ॐ ॐ






चेतना प्रसारण


पुरे ब्रह्मांड में अपनी सकारात्मक ऊर्जा फैलाएं यह आपके   हाथ में हैं | हिमालय के हिम गुफाओं में बैठे अनेकों सूक्ष्म शरीर में अवस्थित संत ये काम करते हैं | और आप भी ये काम कर सकते हैं | ऐसा करने से सकारात्मकता और नकारात्मकता में बैलेंस बना रहता है | अगर आप अपनी सकारात्मकता ब्रह्मांड में फैलायेंगे तो  इसका लाभ आपको भी मिलेगा औरों को तो लाभ मिलेगा हीं |

बहुत हीं आसान उपाय है ऐसा करने का |
आराम से बैठ जाएँ | सुखासन में | रीढ़ की हड्डी सीधी हो,  तनी हुई नहीं |
निचे कोई आसन बिछा लें ऊनी या सूती कुछ भी |
आँखें बंद कर लें |
दो चार लम्बी गहरी साँसें लें और छोड़ दें | आराम से आहिस्ता आहिस्ता जोर लगाकर  नहीं |
अपने ध्यान को आज्ञा चक्र ( दोनों भौं के बीच में ) पर टिका दें तीन से  पांच मिनट तक |
पांच मिनट बाद ,
अपने ध्यान को सर के चोटी पर अपना ध्यान ले जाएँ |
दो से तीन मिनट तक वहां ( सर के चोटी पर ) ध्यान टिकाने के बाद ,
कल्पना करें पुरे ब्रह्माण्ड का , अन्तरिक्ष का इसमें अपनी पृथ्वी का तस्वीर भी देखें |
कल्पना करें एक पवित्र श्वेत ( सफ़ेद ) ईश्वरीय  प्रकाश पुरे ब्रह्माण्ड में फ़ैल रहा है , जिससे अपनी पृथ्वी भी ढकी जा रही है |
बीस से तीस मिनट तक इस कल्पना में डूबे  रहें |
पुन: ध्यान को आज्ञा चक्र पर लायें | तीन से पांच मिनट तक अपना ध्यान आज्ञा चक्र पर रखें |
फिर , अपना  समय लेते हुए अपना ध्यान खोल सकते हैं |
ईश्वरीय श्वेत प्रकाश की कल्पना करने उसमे डूबने पर आप कई बार रोमांचित हो सकते हैं |
यह साधारण सा ध्यान प्रयोग आपके जीवन में क्रान्ति ला सकती है | कर के तो देखें |
ॐ ॐ ॐ

निराशा के क्षणों में एक ध्यान प्रयोग करें |


जीवन में कुछ क्षण ऐसे भी आते हैं जब निराशा के बादल छटने का नाम नहीं लेते ऐसे में अपना दृढ आत्मविश्वाश बनाये रखें और परमात्मा पर विश्वाश रखें | निराशा के बादल छंट जायेंगे चिंता न करें | फिर से सूरज उगेगा फिर से प्रकाश छाएगा जीवन में | मैं जानता हूँ  ये सब कहना आसान  है किन्तु जो वैसे समय को झेलता है वाही जानता है क्या बीत  रही है | फिर भी निराश हताश नहीं हुआ जा सकता जीवन में उम्मीद की किरण होनी चाहिए | बच्चे दौड़ते दौड़ते गिर जाते हैं फिर उठ कर दौड़ने लगते हैं सिर्फ माता की चुचकार सुन कर | वैसे हीं जीवन में हताश हों तो सब झाड पोछ कर उठ खड़े होइए फिर से जीवन की दौड़ में शामिल होइए | जब घोर निराशा का बादल छाया हो तो –
कहीं एकांत में बैठ जाएँ और मन हीं मन यह प्रश्न दुहरायें “ हे ईश्वर  क्या तुम मेरे साथ हो “ बार बार दुहरायें दस मिनट तक दुहराते रहें भीतर से हीं कुछ आवाज़ मिलेगा | एक अजीब शान्ति मह्शूश करेंगे आप | दिखने में यह प्रयोग साधारण है किन्तु आपके भीतर आशा का संचार कर सकता है फिर से जीवन दान दे सकता है यह प्रयोग |


एक ध्यान प्रयोग करें
आराम से सुखासन में बैठ जाएँ
आँखें बंद कर लें
सारा ध्यान साँसों पर हो
एक लम्बी गहरी साँस लें और छोड़ दें , पुनः एक लम्बी गहरी साँस लें और छोड़ दें कम से कम पांच सात बार करें यह |
अब ध्यान को छाती की पसलियों के बीच में ले जाएँ यहाँ अनाहत चक्र है | यहाँ ध्यान को केन्द्रित करें | हो सकता है हृदय की धडकन सुनाई दे अपना ध्यान यहीं केन्द्रित रखें |
अनाहत पर ध्यान के गहरे क्षण ! असीम शांति ! प्रेम का केंद्र अनाहत !
 करीब बीस से तीस मिनट तक अनाहत पर बने रहें |
एकदम शांत वातावरण में यह ध्यान करें | अपने से जुड़ने का भाव प्रबल करें |
असीम शांति अपने भीतर हीं है ऐसा भाव मन में रखें | 
इमानदारी से यह प्रयोग करेंगे तो कुछ न कुछ समाधान अवश्य मिलेगा |



एक ध्यान प्रयोग ( विशुद्धि चक्र पर )

विशुद्धि चक्र हमारे गले में जहाँ कंठ होता है  गले में निकला एक छोटा सा नुकीला भाग ) ठीक उसके पीछे रीढ़ की हड्डी से जुड़ा  हुआ होता है | सम्पूर्ण कंठ क्षेत्र विशुद्धि चक्र के अंतर्गत हीं आता है | इसी क्षेत्र में मन को टिका कर ध्यान करना है | 


आराम से सुखासन में बैठ जाएँ | रीढ़ की हड्डी सीधी हो |
दो चार लम्बी गहरी साँसें लें और छोड़ दें | आराम से आहिस्ता आहिस्ता |
आँखें बंद हों |
ध्यान को आज्ञा चक्र ( दोनों भौं के बीच में ) पर ले आयें |
तीन से पांच मिनट तक आज्ञा चक्र पर मन को ठहराए रहें |
अब  इसके बाद
ध्यान को विशुद्धि चक्र ( कंठ में एक हड्डी उभरी हुई है वहां पर ) पर ले आयें |
अब मन हीं मन हं ( HAM ) मन्त्र का उच्चारण करें | ध्यान रहे जाप मानसिक हो बिलकुल बोल कर नहीं |
20 से 25 मिनट तक कंठ  पर यानी विशुद्धि चक्र पर ध्यान को रखें |
पुनः ध्यान को आज्ञा चक्र पर ले आयें | दो मिनट तक ध्यान को आज्ञा चक्र पर रखें |
इसके बाद ध्यान से बाहर आ सकते हैं |
इस ध्यान प्रयोग के सतत अभ्यास से वाणी में मधुरता आती है | जो व्यक्ति संगीत का अभ्यास करते हैं उन्हें ये ध्यान प्रयोग अवश्य करना चाहिए | साधक को भूख प्यास पर विजय मिलने लगती है | ऐसा विशुद्धि चक्र के निकट स्थित कूर्म  नाडी के सक्रीय होने से होता है भूख प्यास पर विजय | विशुद्धि चक्र के निकट एक और केंद्र है जिसका कार्य एक रेडिओ की तरह होता है आम स्थिति में यह केंद्र सक्रीय नहीं होता किन्तु विशुद्धि चक्र पर ध्यान केन्द्रित करने से यह केंद्र सक्रीय होने लगता है | यह चक्र जब सक्रीय होने लगे तो आप दुसरे के मन की बात समझने लगते हैं | दूसरा क्या सोच रहा है आप जान सकते हैं किन्तु यह अवस्था लम्बे अभ्यास के बाद आता है |
देखने में यह प्रयोग साधारण है किन्तु इसका अभ्यास कर के  खुद इस प्रयोग की महिमा जान सकते हैं |
इति सत्यम ! इति शुभम | 
  

पहले सगुण ध्यान क्यों

काफी लोगों का यह प्रश्न होता है कि आप ध्यान की विधियों में कल्पना करने को क्यों कहते हैं जबकि ध्यान का मतलब तो शून्यता होता है । तो सुनो बाप मेरे ये हमारा मन बहुत चंचल और चतुर है इसको इसी के रास्ते ठिकाने लगाना पड़ता है । यह मन हमेशा दृश्य उतपन्न करता है सुख के दृश्य दुःख के दृश्य हमेशा गतिमान रहना मन का स्वभाव है । तो ध्यान के दरम्यान भी हम इस मन को दृश्य उत्पन्न करने को कहते हैं फर्क यह होता है कि तब मन स्वतन्त्र रूप से दृश्य नहीं उतपन्न करता तब हमारे हिसाब से दृश्य उतपन्न करता है ।

मेरी लिखी  पुस्तक - " ध्यान के रहस्य " 

 हम जैसा कहते हैं वैसे दृश्य सामने आता है । अंत मे क्या होता है मन को जब तक उन दृश्य में खोना होता तब तक खोया रहता है फिर मन चकरा जाता है कि इसके बाद अब क्या यही घड़ी महत्वपूर्ण होती है मन को जब कुछ समझ मे नहीं आता तो क्षणिक शून्यता में आ जाता है । इसलिए ध्यान के समय हर क्षण सजग रहना चाहिए और इस क्षणिक शून्यता की स्थिति को पहचानना चाहिए । जैसे जैसे हम ध्यान में इस शून्यता को पहचानते हैं यह शून्यता क्षणिक से थोड़े थोड़े समय के लिए बढ़ता जाता है । यह शून्यता नैनो सेकेंड में होता है अगर हम ध्यान के समय सजग नहीं होते हैं तो यह शून्यता पकड़ में नहीं आएगा । इसलिए प्रारम्भ में कोई निर्देशित करता हो तो उसके निर्देश के हिसाब से ध्यान करना होता है । किसी के निर्देशन में ध्यान करने से इतनी सजगता बनी रहती है की हमारा ध्यान निर्देश देने वाले के आवाज़ पर स्थिर होता है और हम आवाज़ के प्रति सजग होते हैं । इसलिए ध्यान का शुरुआत अगर किसी के निर्देशन में हो तो अति उत्तम । तो मैं बात कर रहा था शून्यता की । ध्यान में कल्पना के द्वारा मन को अपने अनुकूल चलाया जाता है फिर मन क्षणिक शून्यता में आता है । यह सगुण से निर्गुण में रूप से अरूप में उतरना हुआ । सीधे निर्गुण या अरूप में उतरना बहुत कठिन है । कबीर दास निर्गुण उपासक थे किंतु राम नाम का नाव उन्हें भी पकड़ना पड़ा ।
तो ये कुछ बाते थी जो आपलोगों से शेयर किया ।
हो सकता है यह पोस्ट एक बार पढ़ने से समझ मे न आये तब दो तीन बार सजगता के साथ पढियेगा ।
ध्यान में आप सबों की गति हो ।
ॐ ॐ ॐ

Sunday, 25 June 2017

रहस्यमयी हिमालय 17

सभी साधकों के सामने पंच मकार का रहस्य खुल रहा था  | संध्या ढल चुकी थी रात्री ने अपने पाँव आगे बढ़ा दिए थे | गुफा के अंदर मंद मंद स्वनिर्मित पिला  प्रकाश बिखरा हुआ था | सम्पूर्ण गुफा में कभी चन्दन  कभी मोगरे की तो कभी गुलाब की खुशबू की लहर थोड़े थोड़े समय पर फ़ैल जाती थी |
महायोगी अभेदानन्द ने कहा
“ अच्छा आओ तुम सभी को कुछ दिखाता हूँ | यहाँ उपस्थित सभी व्यक्ति एक दुसरे का हाथ पकड लो फिर मुझे और स्वामी ब्रह्मानन्द को चारो तरफ से  घेर कर बैठ जाओ और आँखें बंद कर  लो |”
कुछ हीं क्षणों में सबने देखा कि वे जिस अवस्था में बैठे हुए थे उसी अवस्था में धरती के उपर उंचाई पर  हैं और अपने आप को सभी वायु के सामान हल्का मह्शूश कर रहें हैं |
सभी ने पाया की वे जिस जगह पर उपर अवस्थित हैं वहां से गंगा नदी में प्रकाश की झिलमिलाहट नजर आ रही थी  | चिताओं के जलने की लपट भी स्पष्ट नजर आ रही थी | उन्होंने देखा चिताओं के अगल बगल में कुछ लोग खड़े हैं कुछ चिताओं को जलाने की कोशिश कर रहें हैं | विचित्र बात ये थी की चिताओं के नजदीक कुछ मानव आकृतिनुमा श्वेत  धुंए के समान आकृतियाँ चिताओं के उपर चिताओं के चारो तरफ मंडरा रही थी |
योगी बाबा ने सबों को संबोधित करते हुए कहा
“अभी हम इस पृथ्वी के सबसे प्राचीन और पवित्र  नगरी काशी के उपर हैं और जो चिताएं तुम देख रहे हो वे मणिकर्णिका घाट तथा हरिश्चन्द्र घाट पर जल रहें हैं | ये काशी नगरी शिव को अत्यंत प्रिय है | यहाँ शिव निवास करते हैं |
तभी एक साधक ने पूछा
“ वहां निचे एक ख़ास स्थान से चांदी के समान हल्का प्रकाश निकल कर चारो तरफ बिखर रहा है ये क्या है |”
योगी बाबा ने कहा
“ वो जो तुम प्रकाश देख रहे वह जहाँ से निकल रहा है वहीँ बाबा काशी विश्वनाथ का प्रसिद्ध  शिवलिंग स्थापित है और वहां से निकल कर प्रकाश सर्वत्र बिखर रहा है | तुम सभी रात्री में उपर से मेरे यौगिक शक्ति के प्रवाह के कारण ये देख पा रहे हो | ये दृश्य सिर्फ सिद्ध साधकों के द्वारा या जिन पर सिद्ध साधकों की कृपा होती है वही देखते हैं | कोई भी सिद्ध साधक उपर से ये प्रकाश भारत में स्थित बारह के बारहों शिव लिंग से निकलता हुआ देख सकता है | इसलिए इन्हें ज्योतिर्लिंग भी कहा जाता है | वैसे तो इस परम जागृत शिव लिंग के ऊर्जा का अहसाह काशी नगरी में प्रवेश करने वाला प्रत्येक आम व्यक्ति भी करता है | काशी में प्रवेश करते हीं विशेष उर्जा का स्पंदन सभी कोई मह्शूश कर सकता है |
एक और साधक ने पुन : एक  सवाल पूछा
“ वहां चिताओं के अगल बगल और उपर उडती हुई धुंए के  सामान मानव आकृतियाँ क्या हैं क्योंकि वे तो मानव प्रतित नहीं  होती |”
महायोगी अभेदानन्द के चेहरे पर एक मुस्कुराहट सी  दौड़ गयी | उन्होंने कहा
“ वे जो आकृतियाँ देख रहे हो वे उन्हीं चिताओं में जलते हुए लोगों की आत्माएं हैं | उन्हें  आत्मा  कहना भी उचित नहीं क्योंकि वे शरीर और आत्मा के बीच की कड़ी हैं | भेद सिर्फ इतना है कि उनका भौतिक शरीर अब नहीं है |  उनका शरीर और सगे सम्बन्धियों से  मोह कुछ ऐसा है कि मृत्यु के बाद भी अपने जलती हुई लाशों को देखने के वावजूद उस शरीर से मोह भंग नहीं हो रहा | वे वहां से तब तक नहीं हटेंगी जब तक की पूर्ण शरीर नहीं जल जाता | कुछ आत्माएं तो अपने सगे सम्बन्धियों के साथ अपने पूर्व के   घर तक भी जाते  हैं | किन्तु शरीर के अभाव  में  कोई चारा न चलते देख कर पुन : शरीर प्राप्ति हेतु पुनर्जन्म लेते हैं गर्भ में प्रवेश कर के एक नन्हे  शिशु के रूप में |”
रात्री के करीब दस बज रहें होंगे | घाटों की चहल पहल कुछ कम होती जा रही थी | हाँ किन्तु मणिकर्णिका और हरिश्चन्द्र घाट पर देर रात घिरते हीं चहल पहल बढ़ रही थी |

*
जारी .....

रहस्यमयी हिमालय 16

दीक्षांत समारोह समाप्त हुआ
महायोगी अभेदानन्द ने बोलना प्रारम्भ किया
“ तंत्र कल्याण का विज्ञान है स्व कल्याण का | तन्त्र के माध्यम से योगी विभिन्न बिजमन्त्रों के द्वारा कुल कुण्डलिनी शक्ति को मूलाधार से उठा कर सहस्त्रार तक ले जाते हैं फिर सहस्त्रार  से पुन : मूलाधार पर ले आते हैं | तंत्र में पञ्च मकार सेवन का विधान है | ये पञ्च मकार हैं – मांस , मध् , मीन , मुद्रा और मैथुन |”
वहां उपस्थित सभी साधक बहुत हीं तल्लीनता से योगी बाबा की बातें सुनते हुए किसी दुसरे हीं लोक में खो गये थे ऐसी ओजस्विता थी उनकी वाणी में |
महायोगी ने आगे कहना प्रारम्भ किया |
"सोमधारा क्षरेद या तु ब्रह्मरंध्राद वरानने|
पीत्वानंदमयास्तां य: स एव मद्यसाधक:||
महायोगी ने रुद्रयामल तन्त्र का ये श्लोक सुनाया | फिर इसके बाद इसका अर्थ उन्होंने इस प्रकार बताया |
“जिह्वा मूल या तालू मूल में जिह्वाग्र ( जीभ का अगला भाग ) को सम्यकृत करके ब्र्ह्मारंध्र ( सिर के चोटी से ) से झरते हुए आज्ञा  (भ्रू मध्य ) चक्र  के चन्द्र मंडल से हो कर प्रवाहमान अमृतधारा को पान करने वाला मद्य साधक कहा जाता है |” 
 जिह्वाग्र ( जीभ का अगला  भाग ) को तालू में लगाना हीं खेचरी मुद्रा कहलाता है ( साधक बिना किसी योग्य गुरु के इस अभ्यास को न करें क्योंकि अमृत के साथ विष का भी स्त्राव उसी स्थान से होता है इसमें गड़बड़ी नहीं होनी चाहिए )
यह वास्तविक मद्यपान कहलाता है |”
एक साधक ने पूछा
“ आज कल के साधक जो बाहरी  मदिरा पान करते हैं क्या ये उचित है मेरे प्रभु |”
महायोगी ने कहना प्रारम्भ किया
“ बाहरी मदिरा पान का भी एक साधक के दृष्टिकोण से महत्व है | कुण्डलिनी शक्ति के उर्ध्वगमन होने पर भारी मात्रा में उर्जा का बहाव शरीर में होता है जो कभी कभी सच्चे साधकों के लिए असहनीय हो जाता है इसी उर्जा के वेग का  प्रभाव कम मह्शूश हो इसलिए मदिरा के माध्यम से  मस्तिष्क को शिथिल करने के लिए यदा कदा उच्च किस्म के साधकों को मदिरापान करना पड़ता है | स्मरण रहे भोग के लिए मदिरापान करना पाप है | औषध रूप में इसका प्रयोग किया जाता है |
सभी तन्त्र साधकों को ये स्मरण रखना चाहिए देखा देखी बिना सोचे समझे तन्त्र मार्ग का हावाला दे कर कभी भी मदिरापान न करें हाँ जब साधना के क्रम  में आवश्यकता मह्शूश हो तब गुरु आज्ञा से हीं बाहरी मदिरा का पान करें |
किन्तु फिर भी साधक को ये प्रयास करना चाहिए कि बाहरी मदिरापान की आवश्यकता न हीं पड़े |
वास्तविक मदिरापान तो ब्रह्मारन्ध्र से गिरते हुए  अमृत को पीना हीं है इस मदिरापान के आनन्द को वर्णन नहीं किया जा सकता |”
योगी बाबा ने समझाया |
आगे योगी बाबा ने कहा
“ आम व्यक्ति एवं सभी जीवों में  जो अमृत ब्रह्मरन्ध्र के बिंदु से  क्षरित होता है वही मूलाधार में आ कर काम उर्जा का निर्माण करता है जिससे सृष्टि के सृजन का कार्य होता है | किन्तु हमारे पूर्वज योगियों ने ध्यान के द्वारा अपने स्वयं के शरीर में प्रवेश कर इसके मर्म को इसके विज्ञान को समझा और युक्तिपूर्वक  एक नए विज्ञान का आविष्कार किया | योगियों के स्व साधना के क्षेत्र में जो भी अविष्कार हुए वे सभी ध्यान की गहरी अवस्था में हुए इसलिए वर्तमान विज्ञान को इसे पकड पाना कठिन है |”
महा योगी के इस ओजमयी ज्ञान का पान वहां उपस्थित सभी साधक तल्लीनता पूर्वक कर रहे थे |  

रहस्यमयी हिमालय - 15

हिमालय का दिव्य वातावरण | चारो  तरफ  बर्फ  से  ढके ऊँचे  ऊँचे  पर्वत | चारो  तरफ  की  हवाओं  में  एक  दिव्य  सुगंध  घुली  हुई | मंद मंद  बहता  समीर | कुल  मिलाकर  वातावरण  को  दिव्य  बना  रहे  थे  ऐसा  प्रतित  हो  रहा  था  जैसे मन  कह उठे   स्वर्ग  यही  तो  है  |
बर्फ  से आच्छादित एक पर्वत  में  स्वामी ब्रह्मानन्द  की गुफा | गुफा में एक  आसन  पर स्वामी  ब्रह्मानन्द  विराज  रहे  थे | गुफा  में  मंद  मंद प्रकाश  बिखरी हुई थी | शीत या उष्णता के प्रभाव से यह गुफा प्रभावित नहीं था ना तो वहां अत्यधिक ठंढ थी न हीं अत्यधिक गर्मी |  निचे विभिन्न आसन  बिछा कर  दस  बारह  साधक बैठे  हुए थे | स्वामी  ब्रह्मानन्द  उन  साधकों  के  साथ किसी  गहन विषय पर चर्चा कर रहे थे |
इसी  बीच  महायोगी अभेदानन्द ने  साधक  सच्चिदानन्द , तरुण  साधक  बटुकनाथ  और उस व्यक्ति के साथ गुफा में  प्रवेश किया |
स्वामी ब्रह्मानन्द और महायोगी अभेदानन्द की प्रेमभरी  दृष्टि  आपस  में  टकराई  | दोनों  के  चेहरे  पर मुस्कान उभर  आई | दोनों  ने एक  दुसरे को सर झुका  कर और हाथ जोड़ कर एक दुसरे का  अभिवादन  किया | महायोगी  के  साथ  आये  साधकों ने स्वामी   ब्रह्मानन्द को  शाष्टांग  प्रणाम  किया  वहां  उपस्थित  साधकों  ने  भी  महायोगी  अभेदानन्द को साष्टांग प्रणाम  किया | स्वामी ब्रह्मानन्द  ने आसन  से  उठ कर महायोगी  को  अपने  आसन पर  बगल  में  बैठने  का अनुरोध  किया | महायोगी  उनके  बगल  में  विराजमान  हो  गये  | सभी  साधकों  ने  भी  निचे  अपने अपने स्थान को  ग्रहण  कर  लिया  |
स्वामी ब्रह्मानन्द  ने उस  व्यक्ति  पर  मुस्कुराते  हुए  दृष्टिपात  किया | उनके  चेहरे  पर ऐसे भाव थे  मानो  वे  पूर्व  से हीं उस व्यक्ति  को  जानते  हों |
महायोगी अभेदानन्द   स्वामी ब्रह्मानन्द की ओर  उन्मुख  होते हुए बोल पड़ें
“ कहें  कैसे  याद  किया |”
“कुछ नहीं प्रभु  ये सभी तन्त्र  के  साधक  हैं  और तंत्र  के  क्षेत्र  में  दस  वर्ष  साधना की है | आगे तन्त्र में  और  गहन यात्रा  हेतु ,तन्त्र के  द्वारा परमज्ञान   प्राप्ति हेतु महाविद्या  तारा  और  महाविद्या  बगलामुखी की दीक्षा लेना  चाहते  हैं  | किन्तु मुझे  इनकी प्रकृति  समझ  में नहीं  आ रही इसलिए  इन्हें  दीक्षित नहीं कर पा रहा  | इस  सम्बन्ध मे  मेरा मार्गदर्शन करें |” स्वामी ब्रह्मानन्द  ने कहा |
महायोगी अभेदानन्द  ने उन  साधकों  पर  दृष्टिपात किया और   आँखे  बंद  कर के गहन ध्यान में  चले  गये |
स्वामी ब्रह्मानन्द और  वहां उपस्थित सभी  साधक  यहाँ तक की  वह  व्यक्ति  भी ध्यान की मुद्रा  में  आ गया  और  ध्यान करने लगे | ( जो  ध्यान  में सिद्धस्त  हो  उसके  निकट  बैठ  कर  मात्र  ध्यान  का  अभिनय  भी  अगर  कोई  करे  तो सहज  हीं  बिना  प्रयास  के  ध्यान  लगने  लगता  है  बस  ध्यान  की  ईच्छा  होनी  चाहिए  )
घंटों  ध्यान के उपरान्त महायोगी अभेदानन्द ने   ने आँखें  खोली | उनके साथ ध्यान  कर  रहे  साधकों का  भी स्वत: आँखें खुल गयी | ( अगर  आप  किसी  के  सान्निध्य  में ध्यान  कर रहें  हो  तो ऐसा  होता  है जिसके सान्निध्य में  आप  ध्यान  कर  रहें  है  वे  अगर  ध्यान  से  बाहर आते  हैं  तब उसी समय  आप भी ध्यान  से बाहर  आते  हैं 90 % मामलों  में | शेष  10 % मामलों  में ऐसा  नहीं  होता  बल्कि आगे  भी  ध्यान  जारी  रहता  है  अगर  ध्यानकर्ता  सिद्धस्त  हो  तब | )
आगे  माहयोगी  ने फिर  से उन  साधकों का निरिक्षण किया और उनमे से तीन  साधकों के तरफ इशारा करते हुए कहा
“ ये तीन आगे गति नहीं कर पायेंगे इनके कर्म कटने अभी बाकी हैं इन्हें और साधना  की आवश्यकता  है | ये तीन अभी  दीक्षा  के  काबिल  नहीं  हैं |”
“ जी  महराज  जी इन तीनों  में  से एक  की  प्रकृति  तो  मुझे  पकड  में  आ रही  थी  किन्तु  इन  दोनों के  बारे  में  आश्वस्त  नहीं  था ध्यान  में  इनकी सूक्ष्म प्रकृति अयोग्यता के संकेत अवश्य  दे रहे थे किन्तु  थोडा अस्पष्ट था | इसलिए  आपको  कष्ट  दिया |” स्वामी ब्रह्मानन्द  ने  कहा |

कुछ समय उपरान्त स्वामी ब्रह्मानन्द के द्वारा महायोगी अभेदानन्द के समक्ष शेष नौ साधकों को दीक्षित किया गया जिसमे से पांच को बगलामुखी महाविद्या की दीक्षा दी गयी शेष चार  को महाविद्या तारा की |