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Thursday, 27 September 2018

चेतना प्रसारण


पुरे ब्रह्मांड में अपनी सकारात्मक ऊर्जा फैलाएं यह आपके   हाथ में हैं | हिमालय के हिम गुफाओं में बैठे अनेकों सूक्ष्म शरीर में अवस्थित संत ये काम करते हैं | और आप भी ये काम कर सकते हैं | ऐसा करने से सकारात्मकता और नकारात्मकता में बैलेंस बना रहता है | अगर आप अपनी सकारात्मकता ब्रह्मांड में फैलायेंगे तो  इसका लाभ आपको भी मिलेगा औरों को तो लाभ मिलेगा हीं |

बहुत हीं आसान उपाय है ऐसा करने का |
आराम से बैठ जाएँ | सुखासन में | रीढ़ की हड्डी सीधी हो,  तनी हुई नहीं |
निचे कोई आसन बिछा लें ऊनी या सूती कुछ भी |
आँखें बंद कर लें |
दो चार लम्बी गहरी साँसें लें और छोड़ दें | आराम से आहिस्ता आहिस्ता जोर लगाकर  नहीं |
अपने ध्यान को आज्ञा चक्र ( दोनों भौं के बीच में ) पर टिका दें तीन से  पांच मिनट तक |
पांच मिनट बाद ,
अपने ध्यान को सर के चोटी पर अपना ध्यान ले जाएँ |
दो से तीन मिनट तक वहां ( सर के चोटी पर ) ध्यान टिकाने के बाद ,
कल्पना करें पुरे ब्रह्माण्ड का , अन्तरिक्ष का इसमें अपनी पृथ्वी का तस्वीर भी देखें |
कल्पना करें एक पवित्र श्वेत ( सफ़ेद ) ईश्वरीय  प्रकाश पुरे ब्रह्माण्ड में फ़ैल रहा है , जिससे अपनी पृथ्वी भी ढकी जा रही है |
बीस से तीस मिनट तक इस कल्पना में डूबे  रहें |
पुन: ध्यान को आज्ञा चक्र पर लायें | तीन से पांच मिनट तक अपना ध्यान आज्ञा चक्र पर रखें |
फिर , अपना  समय लेते हुए अपना ध्यान खोल सकते हैं |
ईश्वरीय श्वेत प्रकाश की कल्पना करने उसमे डूबने पर आप कई बार रोमांचित हो सकते हैं |
यह साधारण सा ध्यान प्रयोग आपके जीवन में क्रान्ति ला सकती है | कर के तो देखें |
ॐ ॐ ॐ

Wednesday, 22 February 2017

रहस्यमयी हिमालय 12

शाम ढल चुकी थी रात्री बाँहें पसार  चुकी थी |
नौजवान योगी सच्चिदानन्द ध्यान में मग्न थे | वह व्यक्ति गुफा के दिवार का सहारा ले कर पीठ के बल उठंग कर बैठा हुआ था | उसकी आँखें कहीं खोई हुई थी | देखने पर साफ़ पता चलता था कि वह उस गुफा में मौजूद हो कर भी मौजूद नहीं था | उसके चेहरे पर उदासी साफ़ झलक रही थी |
इसी बीच महायोगी अभेदानन्द ने ध्यान से निकल कर  अपनी आँखें खोली | उस व्यक्ति के चेहरे पर अपनी नजर टिकाते हुए उससे पूछा “ मैं देख रहा हूँ तुम यहाँ हो कर भी यहाँ  मौजूद नहीं हो |”
उसने सकपकाते हुए  कहा “ नहीं बाबा जी यहीं तो हूँ |”
“ मैं देख रहा हूँ तुम सशरीर यहाँ उपस्थित हो कर भी तुम अपने घर में अपने परिवार के बीच मौजूद हो | लगता है तुम्हें अपना घर बार , सगे सम्बन्धी , परिवार याद आ रहें हैं |”
उसकी आँखों से दो बूँदें लुढक आई | और मौन रह गया |
योगी बाबा ने उसे संबोधित करते हुए कहा “घर जाना चाहते हो |”
“नहीं नहीं बाबा जी मैं यहाँ खुश हूँ | अध्यात्मिक जीवन में मेरी उन्नति हो आपकी कृपा से  ऐसी आकांक्षा रखता हूँ |”
“ अच्छा आओ तुम्हें तुम्हारे घर पर ले चलूं |” योगी बाबा ने कहा
योगी अभेदानन्द ने उसके हाथ पकडे और उससे कहा “ आँखें बंद कर लो क्योंकि अब जिस गति से हम विचरण करेंगे वह विज्ञान के द्वारा भी किसी वाहन ने नहीं प्राप्त किया है | जब मैं कहूँ तभी आँखें खोलना |”
उसने अपनी आँखें बंद कर ली महायोगी अभेदानन्द ने उसका हाथ पकड़ा और वे दोनों सशरीर उसके घर के सामने उपस्थित थे |
योगी बाबा ने कहा “ आँखें खोलो|” 
उसके तो मारे प्रसन्नता के चेहरा खिल गया |
महायोगी ने कहा “ जाओ घर से हो आओ मैं तुम्हारा इन्तजार करूँगा | जब सभी से मिलना हो जाएगा तब मुझे याद करना मैं तुम्हारे  पास आ जाऊँगा  |”
“ आप मेरे घर नहीं आयेंगे |” उसने पूछा
“ अभी मेरा गृहस्ततों के घर में प्रवेश करना वर्जित है |” योगी बाबा ने कहा
अब उसकी तन्द्रा टूटी | उसने पूछा तो क्या हम सशरीर यहाँ मौजूद हैं क्या ये हम दोनों का सूक्ष्म शरीर नहीं है |”
योगी बाबा ने कहा “ हाँ हम सशरीर यहाँ मौजूद हैं | यह हम दोनों का भौतिक शरीर हीं है | योगी चाहे तो अपने साथ कई व्यक्तियों को अपनी मदद से जहाँ चाहें वहां पहुंचा सकते हैं सशरीर |”
अब उसके सामने एक नया  रहस्य मुंह बाए खड़ा था |
योगी बाबा ने कहा “ जाओ |”
वह अपने घर में प्रवेश किया पहले तो उसके परिवार वाले आश्चर्य से भर गये | अभी रात्री के समय ये यहाँ कैसे उपस्थित हो गया किन्तु ये भूल कर उसके परिवार वाले भावुक हो गये उसे देख कर | भावुक वह भी हो चला |
उसकी वृद्ध माँ ने उससे  कहा
“ बेटा तुम तो छुटियाँ गुजारने गये थे हिमालय की तरफ तुम्हारे साथ गये सभी लोग वापस आ गयें किन्तु तुम क्यों वापस नहीं आये | तुम्हारे मित्रगण कह रहे थे किसी साधू के पास तुम ठहरे हुए थे | खैर चलो अब वापस आ गये हो अपना काम धंधा संभालो |”
उसने अपनी माँ से कहा “ माँ मैं अब यहाँ नहीं रह पाऊंगा मुझे जीवन के ढेर सारे रहस्य जानने हैं और परमपिता परमात्मा की कृपा से मुझे बहुत हीं सिद्ध संत भी मिल गये हैं | उन बाबा जी कृपा हुई तो मैं हमेशा तुम लोगों के सम्पर्क में रहूँगा | मेरी चिंता न करना |”
उसकी माँ यह सुन कर रोने लगी | उसने बार बार चुप कराने की कोशिश की किन्तु वह देर तक रोती रही और वह अपनी माँ को कुतुहुलता से देखता रहा |
अपने परिवार के लोगों के द्वारा  बार बार जाने से  मना करने के बाद भी जब वह नहीं माना तब अंतत: उसकी माँ ने कहा “ जा बेटे जिसमे तेरी ख़ुशी “| ( अपने संतान के सुख के आगे माताएं हमेसा नतमस्तक हुईं हैं इतिहास गवाह है और यह अकाट्य सत्य है | माताओं ने  अपनी ख़ुशी की परवाह कभी नहीं की संतानों के आगे इसलिए भगवान के बाद का स्थान माँ का है  )



कुछ घंटे अपने परिवार के बीच  गुजारने के बाद  वह निकल पड़ा घर से | अब उसका मन जीवन के रहस्यों को समझना चाहता था |
घर से निकलने के बाद वह अपने मुहल्ले के नुक्कड़ पर आ गया था | वहां कई दुकानें थी चाय आदि के होटल भी जहाँ वह कभी दोस्तों के साथ चाय वगैरह पिया करता था | अभी  ज्यादा रात्री नहीं गुजरी थी | दुकानों पर अभी भी चहल पहल मौजूद थी | चाय की दूकान पर वह देखा उसके कई मित्र बैठ कर गप्प ठहाका लगा रहे थे | वह उनके बीच चला गया | उसके सभी मित्र उसे देख कर हतप्रभ रह गये | खुश भी हुए | उन मित्रों को यह पता था कि वह कहाँ था इतने दिन | उनमे से एक मित्र ने उससे पूछा
“ अब आ गये हो तुम जहाँ काम करते थे वहां के  मालिक को हमने मना कर रखा है वह इस बात पर राजी है कि अगर वह आ गया तो उसे काम पर रख लेंगे | कल चले जाना उसके पास |”
उसने कहा “ तुम मित्रों का बहुत बहुत अहसानमन्द हूँ मैं जो तुमलोगों ने मेरे बारे में सोचा किन्तु अब मेरे जीवन का कुछ और उदेश्य है | मैं ज्यदा देर यहाँ तुम लोगों के साथ नहीं रुक पाऊंगा मैं वहीँ जा रहा हूँ हिमालय के बीच |”
“तो तुमने पका निर्णय कर लिया है |” उसके एक मित्र ने पूछा
“हाँ ” कह कर वह  योगी बाबा का स्मरण करने लगा |
उसने सामने से देखा योगी बाबा चले आ रहें हैं | उसने अपने मित्रों से कहा “देखो सामने मेरे गुरु मेरे भगवान  चले आ रहें हैं |”
किन्तु उसके मित्रों को कोई सामने दिखाई नहीं दे रहा था | वह उनके बीच से निकल कर योगी बाबा के नजदीक चला गया |
योगी बाबा ने पूछा “ तो चलें |”
ऐसा कह कर योगी बाबा ने उसके हाथ पकड लिए और आँखें बंद करने को कहा |

दोनों पुन : गुफा में मौजूद थे |

Wednesday, 8 June 2016

Joy of meditation ध्यान का आनन्द

एक नवयुवक एक महात्मा  के पास गया | महात्मा भी थे उच्च कोटि के उम्र लगभग नब्बे के करीब | युवक महात्मा के पास पहुँच कर उनके सामने  हाँथ जोड़ कर विनती की | उसने कहा – “ महात्मन ध्यान क्या है , समाधि क्या है , परमात्मा क्या है |” युवक के आँखों में प्यास थी | उसकी जिज्ञासा और प्यास देख कर महात्मा ने कहा – “ इसमें देर किस बात की लो जान लो |” ऐसा कह कर महात्मा ने अपने पैर के  दायें अंगूठे से युवक के सर के चोटी ( जहाँ ब्राह्मण चुटिया रखते हैं , सहस्त्रार ) पर स्पर्श कराया | युवक निढाल हो कर गिर पड़ा | उसे अपनी सुध बुध न थी | घंटों वह उस अवस्था में पड़ा रहा | जब उसकी चेतना वापस आयी तब महात्मा उसके आँखों में देख कर मुस्कुरा रहे थे | युवक भाव शून्य नेत्रों से महात्मा को निहारता रहा घंटों |



       कुछ देर बाद महात्मा ने युवक से पूछा और कुछ ? युवक ने अपने हाथ जोड़ कर कहा नहीं | फिर युवक के मन का कीड़ा कुलबुला गया और महात्मा से पूछ बैठा -  “यह क्या था |” महात्मा ने कहा मैंने – “ अपने तपो बल से तुम्हारे उपर क्षणिक शक्तिपात किया था ताकि तुम परमात्मा की शक्ति को मह्शूश कर  सको |  अब तुम एकांत रहते हुए सदा  मौन तथा ब्रह्मचर्य  का पालन करते हुए  अपने दोनों भ्रू मध्यों के बीच आज्ञा चक्र पर ध्यान लगाते रहना | जब तुम आज्ञा चक्र पर ध्यान लगाओगे तब मैं तुम्हारे सम्पर्क में रहूँगा |” इतना कह कर महात्मा ने युवक को जाने का इशारा किया | युवक वहां से प्रस्थान कर गया |
       करीब आधी रात्री को वह युवक गंगा के किनारे बैठ कर महात्मा के कहे अनुसार ध्यान लगाने लगा | कुछ देर तो कुछ भी पता न चला सिर्फ अन्धकार हीं अन्धकार दिखे | किन्तु थोडा प्रयास के बाद एक छोटा सा प्रकाश का बिंदु उसे नजर आया | वह उसी बिंदु पर ध्यान केन्द्रित करने लगा | वह देखता है कि वह छोटा प्रकाश पुंज कभी तो बिलकुल छोटा और कभी बढ़ कर सिक्के के अकार का हो जाए बिलकुल श्वेत चांदी के रंग का प्रकाश | वह यह खेल को घंटो देखता रहा | एकाएक वह छोटा प्रकाश पुंज बढ़ कर बड़ा अकार ले लिया और उसमे महात्मा का चेहरा नजर आया | महात्मा ने उस प्रकाश पुंज के अंदर से पूछा – “ क्यों सब ठीक चल रहा है न !”
       उस युवक का गला रुन्द्द आया कुछ भी बोलते न बन पड़ा | वह रोता रहा घंटो रोता रहा | उसका ध्यान कब टूट गया उसे पता हीं नहीं चला |



-    कल्पना पर आधारित किन्तु सत्य से ओत प्रोत कथा 

Saturday, 4 June 2016

How to calm mind during meditation. ध्यान के दरम्यान मन शांत कैसे करें

मन  बहुत  चंचल है | जब  ध्यान  करने  बैठो उसी वक्त यह ज्यादा परेशान करता  है शांत हीं नहीं होता |  इसका  ईलाज है  कारगार  ईलाज  ! आखिर मन  के उपर  भी  उसका  बाप  आत्मा जो  बैठा  है  ईलाज  कैसे नहीं  मिलेगा  | ऐसे में अधिकाँश साधक आत्म सुझाव ( Auto suggestion ) का सहारा लेते हैं | जैसे की मन  हीं मन वे  दुहराते हैं ” मेरा मन  शांत हो  रहा  है .............मेरा मन  शांत  हो  रहा  है ........|” लेकिन कई बार  यह भी कार्य  नहीं करता तब क्या करें ? ऐसे में एक रामबाण ईलाज है !
शान्ति  से सुखासन में बैठ  जाएँ |
रीढ़ की हड्डी  सीधी  तनी हुई नहीं |

तीन बार  अनुलोम  विलोम प्राणायाम  कर  लें ( नहीं भी करेंगे तो चलेगा )
अब एक  गहरी  लम्बी सांस अंदर खींचते हुए ॐ ................का उच्चारण करें साँसों को छोड़ते हुए |
फिर  एक  बार ॐ .............................
ॐ  का उच्चारण करते रहें |
आपके ॐ के उच्चारण  से शरीर में स्पंदन होने लगेगा |
इस  स्पंदन को मह्शूश करें |
ॐ का उच्चारण सिर्फ मुंह से नहीं हृदय से करें |
अपने अहं को ॐ में विलीन कर दें |
शरीर और मन में ॐ के प्रकम्पन को मह्हूश करें |
आप  देखेंगे आपका मन  शांत  हो  गया है |

ॐ ॐ ॐ 

Sunday, 22 November 2015

ध्यान क्या है अपने भीतर प्रवेश करना |

बाहर  के जगत से तो हम परिचित  हैं हीं | अपना स्वभाव हीं ऐसा है कि सिर्फ और सिर्फ बाहर हीं विचरण करते रहते हैं हम सभी | अस्सी प्रतिशत बाहरी जगत से हम आँख के द्वारा परिचित होते हैं | यानी अधिकाँश आकर्षण आँख के द्वारा हीं पैदा होता है | इसलिए ध्यान करने के पहले हमें आँख बंद करना होता है | तब भीतर का जगत दीखता है थोडा सा | थोडा सा इसलिए क्योंकि फिर कल्पनाएँ हावी होने लगती है खुद पर | आँख बंद हुआ नहीं की कल्पना का घोडा दौड़ना शुरू | कभी भविष्य का  ख्याली पुलाव पकाते हुए तो कभी अतित को   याद करते हुए | मन स्थिर होता हीं नहीं स्वभाव हीं इसका ऐसा है स्थिर होगा भी कैसे | तो कोई युक्ति लगानी होगी और हम कह सकते हैं यह युक्ति है ध्यान | ध्यान में मन को शरीर के भीतर भ्रमण करने का छूट दिया जाता है | 

कभी साँसों पर ध्यान केन्द्रित करना होता है तो कभी हृदय की धडकन पर | ध्यान में शरीर के भीतर हो रहे  रक्त संचरण को भी सुना जा सकता है | तो मन शरीर में हो रही संवेदनाओं के प्रति सजग होने लगता है और रहस्य खुलने लगते हैं | एक से एक कौतुक दिखते हैं बंद आँखों से शरीर के भीतर किन्तु हम तो कभी शरीर के भीतर जाते हीं नहीं सिर्फ बाहर विचरण करते रहते हैं |

       एक के बाद एक रहस्यों से पर्दा उठता जाता है शरीर के भीतर विचरण करने पर और अंतत: उसका दीदार होता है अरे भाई उसी का जो हम वास्तव में हैं परमात्मा कहें बड़े स्तर पर या आत्मा कहें छोटे स्तर पर ! 

ये  विडिओ  आपके  ध्यान लगाने  में सहयोगी होगा 

Friday, 6 November 2015

ईश्वर की खुमारी ( मूलाधार चक्र की यात्रा )

वह अपने हीं शरीर का अवलोकन कर स्तब्ध था | इसके पूर्व उसने अपने हीं शरीर की ऐसी यात्रा कभी नहीं की थी | वाह ईश्वर ! वाह ! अदभुत है तेरी कृति | मन हीं मन वह विचारने लगा |सम्पूर्ण शरीर में भाँती भाँती के अदभुत प्रकाश जिसे उसे अपनी बाहरी दुनिया में कभी नहीं देखा था सभी दिखाई दे रहे थे | उसने तो शरीर में सात चक्रों के बारे में  सुन रखा था यहाँ तो शरीर के भीतर सर से पाँव तक अनेकों अनेक चक्र दिखाई दे रहे थे उसे |
वह स्तब्ध हो कर मनीषी से पूछा -  “ यहाँ तो अनेकों चक्र हैं शरीर के भीतर |”
-    “ हाँ |”  मनीषी ने जबाब दिया
-    “ दरअसल यही सारे चक्र मनुष्यों के शरीर का संचालन करते हैं दिव्य ईश्वरीय तरंगो के द्वारा | सूर्य का प्रकाश भी इसमें सहायक है | ये चक्र पृथ्वी पर मौजूद प्रत्येक प्राणियों में स्थित है यहाँ तक की पेड़ पौधों में भी | तुम्हें क्या लगता है कि तुम सिर्फ भोजन ,जल एवं वायु से हीं जीवित हो ” मनीषी ने कहा |
-    “अच्छा इधर आओ यहाँ देखो जनेंन्द्रिय से थोडा पीछे रीढ़ की अंतिम हड्डी से थोडा आगे दोनों के मध्य में क्या दिखाई देता है ? मनीषी ने पूछा |
वह गौर से उस ओर देखने लगा जहाँ मनीषी ने निर्देशित किया था
-    “अदभुत ! अदभुत ! यहाँ तो अदभुत सुगंध व्याप्त है जैसा की बाह्य जगत में  नहीं |” उसके मन में गूँज उठा
-    “यहाँ तो पीले प्रकाश की अदभुत छटा है और दिव्य सुगंध भी  |” उसने कहा
-    “प्रकाश के पार देखो | अपने दृष्टि और सूक्ष्म करो |” मनीषी ने कहा |  
-    “ओह्ह हो ! यहाँ तो मुझे कमल की चार पंखुडियां नजर आ रही है जो की बाहरी जगत में दिखने वाले लाल रंग सी प्रतीत हो रहीं हैं फिर भी रंगों की कोई तुलना भी की जा सकती  | ” उसने कहा |
-    “दृष्टि को और सूक्ष्म करो |” मनीषी ने निर्देश दिया और उसका हाथ अपने हाथों में पकड लिया | हाथ मनीषी के हाथ में आते हीं उसकी दृष्टि और खुल गयी |
-    “अह्ह्ह ! अदभुत ! मेरे भगवन ! इन प्रत्येक  पंखुड़ियों पर तो एक एक अक्षर खुदे हुए हैं जिनका रंग अदभुत सुनहला है |” उसने कहा
-    “निरिक्षण करते जाओ |” मनीषी ने आदेशात्मक लहजे में कहा |

-    “अरे ये क्या यहाँ तो एक वर्गाकार आकृति है इसका रंग पिला है | पिला प्रकाश तो यहीं से फूट रहा है | इस पीले प्रकाश , वर्ग , और कमल के चार पंखुड़ियों का क्या रहस्य है भगवन ! यह क्या है |”
-    “ तुम जहाँ स्थित हो इस वक्त यह मूलाधार चक्र है | इस चक्र का तत्व पृथ्वी है इसलिए यहाँ पीले रंग की प्रधानता हैऔर सुगंध बिद्यमान है  | इस चक्र की  तन्मात्रा गंध है | दरअसल यहाँ की  प्रधान तन्मात्रा गंध है | पृथ्वी तत्व में और तन्मात्राओं की भी विशेषता होती है जैसे  रूप , रस , स्पर्श , शब्द |  और उपर यात्रा करने पर ये भी दृश्य होंगे | प्रधान तन्मात्रा गंध होने के कारण तुम्हें सुगंध मह्शूश हुआ | मानव मूलाधार चक्र के स्तर पर हीं जीता है | इसलिए इस चक्र के गुण उसे खींचते हैं | पाँचों तन्मात्राएँ सक्रीय होने के कारण मनुष्य इन तन्मात्राओं के गुण की ओर आकर्षित होता है | अर्थात गंध , रूप , रस , स्पर्श  तथा शब्द से मनुष्य आकर्षित होता है और काम (वासना ) का निर्माण होता है मनुष्यों में |प्रत्येक इन्द्रिय एक एक तन्मात्राओं से जुडी हुईं हैं | बाह्य जगत से ये चक्र हीं  अपने स्वभावनुसार गुणों को खींचकर इन्द्रियाँ के माध्यम से मनुष्य में उथल पुथल मचाते हैं(मनीषी के चेहरे पर मुस्कुराहट थी) ऐसा इसलिए क्योंकि ये चक्र जागृत नहीं हैं |
-    “जागृत नहीं हैं तो फिर ये कार्य कैसे कर रहें हैं जैसा आपने बताया |” उसने प्रश्न  दागा |
-    “ कहने का तात्पर्य ये है कि ये चक्र अपने स्वाभाविक अवस्था में कार्य कर रहें है जागृत या अधिक उर्जावान हो कर नहीं |”
-    “ क्या वर्ग की आकृति वैसी हीं है जैसा तुम बाह्य जगत में देखते हो |” मनीषी ने पूछा |
-    “ नहीं यह वर्ग तो अदभुत है इसके चारों कोनों पर भाले की नोक जैसी आकृति बनी हुई है | और वर्ग के चारो भुजाओं के मध्य में भी नुकीली आकृति दृश्यमान है नुकीली आकृति का रंग भी अदभुत सुहला है  |” उसने कहा |

मनीषी मन हीं मन मुस्कुराए और कहा – और आगे दृष्टिपात करो |
 जारी ........

ईश्वर की खुमारी - 2

गतांक से आगे ........
शाम ढलने को आई थी  वह ध्यान लगाने के लिए तत्पर था | कुश  आसन बिछा कर उस पर पद्मासन लगाये ध्यान को नासिकाग्र पर स्थिर करते हुए प्राणायाम का अभ्यास कर रहा था वह | किन्तु ध्यान लग नहीं रहा था | ख्याल में बार बार वही ऋषि जैसे दिखने वाले महात्मन का ख्याल आ जाता था | (पूरी कथा के लिए पढ़ें पिछला भाग ब्लॉग पर जा कर  )
लाख प्रयत्नों के वावजूद आज ध्यान नहीं लग रहा था | अंतत उठ कर उपरी मंजिल के  कमरे से होते हुए बालकनी में आया | वहां से गंगा की कल कल ध्वनी सुनाई दे रही थी  और बाहर का  वातावरण बिलकुल हीं मनमोहक लगने लगा उसे | आराम कुर्सी ( Rest Chair ) पर पीठ टिकाये न जाने किस क्षण उसकी आँख झपक गयी | ध्यान जैसी तन्द्रा अवस्था में पुन : उसके मन: क्षेत्र में उन महापुरुष का आगमन हो चुका था | लगा कुछ क्षण के लिए  हजारों वाट का बल्ब जल गया हो | किन्तु कुछ क्षणों में हीं पिला मद्धिम प्रकाश रह गया मन: क्षेत्र में | इस बार पीली रेशमी कुर्ते और पीली रेशमी धोती पहने नजर आये वे |

-    “किन ख्यालों में हो |” महात्मन ने पूछा
-    “नहीं मैं सोच रहा था आप कौन हैं |” उसने कहा
-    “समय आने पर सब बता दूंगा | मैं साफ़ देख रहा हूँ तुम्हारे भीतर आत्म ज्ञान तथा ब्रह्म ज्ञान पाने की आतुरता हिलोरें ले रहीं है | ” महात्मन ने कहा
-    “जी निसंदेह आप मेरे  मन: क्षेत्र में हैं और आपसे मेरे  मन की कोई बात नहीं छिपी हुई है |” उसने कहा
-    हूँन्न्न्न............ और वे मंद मंद मुस्काने लगे |
-    “अच्छा बताओ तो जरा मैं और तुम तुम्हारे खोपड़ी के जिस भाग में हैं उस क्षेत्र को क्या कहतें हैं |” उन्होंने पूछा |
-    “जी मेरी मति तो कहती है ये चिदाकाश है |” उसने कहा |
-    सत्य है ! चिदाकाश चित का आकाश जहाँ  एकाग्र होने पर चित यानी मन की गतिविधियाँ विचार आदि  दिखाई देने लगती है और तुम साक्षी बन जाते हो |” ऋषि जैसे दिखने वाले महापुरुष ने कहा |
-    “ जी |” उसने कहा 
-    “अच्छा आओ मेरे पीछे पीछे जरा तुम्हारे शरीर का भीतर से निरिक्षण करूँ |” महा पुरुष ने कहा
कुछ हीं क्षणों में सम्पूर्ण शरीर में भ्रमण के बाद दोनों शरीर के भीतर हीं एक बिंदु पर खड़े थे |
-    “क्या दिखाई देता है ?” महात्मन ने पूछा |
-    “जी  पाँव से सर के चोटी तक केवल भवंर ( चक्र ) हीं भंवर नजर आ रहे हैं | प्रतीत होता है इन भंवरों  से शक्ति बाहर निकल कर सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त हो रही है |” उसने अपने आज्ञा चक्र वाले चक्षु से देख कर कहा |
महापुरुष के चेहरे पर मंद मुस्कान उभर आयी


आगे जारी है .......

Tuesday, 3 November 2015

ईश्वर की खुमारी

उसकी आज्ञा चक्र जागृत थी | वह देख सकता था वह सब कुछ जो घटित होने वाला था या घटित हो चुका था | बस परेशानी यह थी  कि यह  स्वयं उस पर लागू नहीं थी |  उसकी उम्र रही होगी कोई पचीस साल | अदभुत नौजवान गठीला बदन , घुंघराले बाल , उभरी हुई कपाल और कपाल पर अभूतपूर्व तेज़ | किन्तु मन अभी भी स्थिर नहीं था उसका |  बेचैनी की एक पतली सी लकीर अभी भी उसके चेहरे पर देखी  जा सकती थी | उसे सत्य की खोज थी बाल्यकाल से हीं |
ऋषिकेश में गंगा किनारे बालू ( रेत ) पर बैठ कर ध्यानमग्न था वह | अप्रतिम लोक का अवलोकन कर रहा था | उसके साँस लेने में लयबद्धता थी | नाप तौल कर साँस लेता था और छोड़ता था | प्राणायाम का अभ्यासी था वह | अपने हीं भीतर खोया हुआ भ्रूमध्य में ध्यान लगाये हुए एक अलग लोक में छलांग लगाने को तैयार था वह | अदभुत प्रकाश का अवलोकन कर रहा था वह |
अपने हीं मानस  लोक में विचरण कर रहा था वह की सघन प्रकाश के मध्य एक आकृति प्रगट  हुई उसके मनसपटल पर | आकृति धुंधली थी अभी ध्यान को और गहन करने की आवश्यकता थी | ध्यान गहन होता गया आकृति स्पष्ट होती जा रही थी | अब उसके मानस पटल पर साफ़ छवि उभर आई थी | लम्बा डीलडौल  कद , चांदी के मानिंद लम्बे धवल केश और दाढ़ी बिलकुल सफ़ेद | आँखों की पुतलियाँ काली किन्तु भौ का रंग बिलकुल श्वेत | उपर से निचे तक एक हीं सफ़ेद  कौपीन धारण किये वह शख्सियत किसी प्राचीन काल के ऋषि की याद दिला रहें थे |
वह मन हीं मन चौक गया , क्या यह उसकी कल्पना है या यथार्थ | तभी उस ऋषि के समान लगने वाले व्यक्ति ने कहा “ अपने मन को किंचित कष्ट न दो , मैं यथार्थ हीं हूँ |”
मन हीं मन वह उन ऋषि जैसे लगने वाले से बात करने लगा |

- “ आप कौन हैं |”
- मैं हिमालय में निवास करनेवाला एक साधक मात्र हूँ |” ऋषि के समान लगने वाले महापुरुष ने कहा |
- “आप मेरे लिए यथार्थ हैं या कल्पना |”
- “ मैं यथार्थ हूँ और किसी के भी मन: क्षेत्र में प्रवेश कर जाना मेरे लिए आसान है | तुम्हें व्यथित देख मैं तुम्हारे मन: क्षेत्र में आया हूँ | बोलो क्या चाहिए |”
- “आत्म ज्ञान ब्रह्म ज्ञान !” उसने उतर दिया
- “ओह्ह !  हो ! बहुत हीं शुभ विचार है किन्तु इसके लिए तो और जी तोड़ प्रयास की आवश्यकता है , वैसे मैं जहाँ तक अवलोकन कर पा रहा हूँ तुमने स्वयं अपनी साधना के बदौलत थोडा मार्ग तय कर रखा है   | तुम्हारी आज्ञा चक्र जागृत प्रतीत हो रही है मुझे | यह दिव्य लक्षण है तुम्हारे लिए | ”
- “जी ! क्या आप मुझे और  मार्ग सुझायेंगे |”
- “ जरुर , जहाँ तुम रहते हो और जिसके निर्देशन में अपनी साधना कर रहे हो वहां भी कुछ गलत नहीं निर्देशित हो रहा तुम्हारे लिए | मैं भी निर्देशन करूँगा तुम्हारे लिए  किन्तु अभी नहीं अभी मुझे आवश्यक कार्य से अपने साधना स्थली के तरफ जाना है , मैं तुमसे पुन : सम्पर्क करूँगा  | ” यह कह कर वह दिव्य व्यक्तित्व लीन हो गयी | और उस साधक के  भीतर रह गयी  एक मधुर और ताजगी देने वाली खुमारी | जैसे अभी अभी स्नान किया हो |
वह आँख मलते मलते उठा उसका ध्यान भंग हो चुका था , मानस में विचारें हिलोरें ले रहीं थी | उसने जो देखा था स्वप्न नहीं था यह तो कम से कम उसके साधना ने यह बता दिया था | फिर क्या था रहस्य इसका इस पर मनन करते हुए वह ऋषिकेश के गंगा किनारे आश्रम वाले उस कमरे की तरफ बढ़ चला जहाँ उसका निवास और साधना स्थली थी |

फिर हाज़िर होऊंगा _/\_ हाज़िर होता हीं रहूँगा _/\_