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Sunday, 25 June 2017

रहस्यमयी हिमालय 17

सभी साधकों के सामने पंच मकार का रहस्य खुल रहा था  | संध्या ढल चुकी थी रात्री ने अपने पाँव आगे बढ़ा दिए थे | गुफा के अंदर मंद मंद स्वनिर्मित पिला  प्रकाश बिखरा हुआ था | सम्पूर्ण गुफा में कभी चन्दन  कभी मोगरे की तो कभी गुलाब की खुशबू की लहर थोड़े थोड़े समय पर फ़ैल जाती थी |
महायोगी अभेदानन्द ने कहा
“ अच्छा आओ तुम सभी को कुछ दिखाता हूँ | यहाँ उपस्थित सभी व्यक्ति एक दुसरे का हाथ पकड लो फिर मुझे और स्वामी ब्रह्मानन्द को चारो तरफ से  घेर कर बैठ जाओ और आँखें बंद कर  लो |”
कुछ हीं क्षणों में सबने देखा कि वे जिस अवस्था में बैठे हुए थे उसी अवस्था में धरती के उपर उंचाई पर  हैं और अपने आप को सभी वायु के सामान हल्का मह्शूश कर रहें हैं |
सभी ने पाया की वे जिस जगह पर उपर अवस्थित हैं वहां से गंगा नदी में प्रकाश की झिलमिलाहट नजर आ रही थी  | चिताओं के जलने की लपट भी स्पष्ट नजर आ रही थी | उन्होंने देखा चिताओं के अगल बगल में कुछ लोग खड़े हैं कुछ चिताओं को जलाने की कोशिश कर रहें हैं | विचित्र बात ये थी की चिताओं के नजदीक कुछ मानव आकृतिनुमा श्वेत  धुंए के समान आकृतियाँ चिताओं के उपर चिताओं के चारो तरफ मंडरा रही थी |
योगी बाबा ने सबों को संबोधित करते हुए कहा
“अभी हम इस पृथ्वी के सबसे प्राचीन और पवित्र  नगरी काशी के उपर हैं और जो चिताएं तुम देख रहे हो वे मणिकर्णिका घाट तथा हरिश्चन्द्र घाट पर जल रहें हैं | ये काशी नगरी शिव को अत्यंत प्रिय है | यहाँ शिव निवास करते हैं |
तभी एक साधक ने पूछा
“ वहां निचे एक ख़ास स्थान से चांदी के समान हल्का प्रकाश निकल कर चारो तरफ बिखर रहा है ये क्या है |”
योगी बाबा ने कहा
“ वो जो तुम प्रकाश देख रहे वह जहाँ से निकल रहा है वहीँ बाबा काशी विश्वनाथ का प्रसिद्ध  शिवलिंग स्थापित है और वहां से निकल कर प्रकाश सर्वत्र बिखर रहा है | तुम सभी रात्री में उपर से मेरे यौगिक शक्ति के प्रवाह के कारण ये देख पा रहे हो | ये दृश्य सिर्फ सिद्ध साधकों के द्वारा या जिन पर सिद्ध साधकों की कृपा होती है वही देखते हैं | कोई भी सिद्ध साधक उपर से ये प्रकाश भारत में स्थित बारह के बारहों शिव लिंग से निकलता हुआ देख सकता है | इसलिए इन्हें ज्योतिर्लिंग भी कहा जाता है | वैसे तो इस परम जागृत शिव लिंग के ऊर्जा का अहसाह काशी नगरी में प्रवेश करने वाला प्रत्येक आम व्यक्ति भी करता है | काशी में प्रवेश करते हीं विशेष उर्जा का स्पंदन सभी कोई मह्शूश कर सकता है |
एक और साधक ने पुन : एक  सवाल पूछा
“ वहां चिताओं के अगल बगल और उपर उडती हुई धुंए के  सामान मानव आकृतियाँ क्या हैं क्योंकि वे तो मानव प्रतित नहीं  होती |”
महायोगी अभेदानन्द के चेहरे पर एक मुस्कुराहट सी  दौड़ गयी | उन्होंने कहा
“ वे जो आकृतियाँ देख रहे हो वे उन्हीं चिताओं में जलते हुए लोगों की आत्माएं हैं | उन्हें  आत्मा  कहना भी उचित नहीं क्योंकि वे शरीर और आत्मा के बीच की कड़ी हैं | भेद सिर्फ इतना है कि उनका भौतिक शरीर अब नहीं है |  उनका शरीर और सगे सम्बन्धियों से  मोह कुछ ऐसा है कि मृत्यु के बाद भी अपने जलती हुई लाशों को देखने के वावजूद उस शरीर से मोह भंग नहीं हो रहा | वे वहां से तब तक नहीं हटेंगी जब तक की पूर्ण शरीर नहीं जल जाता | कुछ आत्माएं तो अपने सगे सम्बन्धियों के साथ अपने पूर्व के   घर तक भी जाते  हैं | किन्तु शरीर के अभाव  में  कोई चारा न चलते देख कर पुन : शरीर प्राप्ति हेतु पुनर्जन्म लेते हैं गर्भ में प्रवेश कर के एक नन्हे  शिशु के रूप में |”
रात्री के करीब दस बज रहें होंगे | घाटों की चहल पहल कुछ कम होती जा रही थी | हाँ किन्तु मणिकर्णिका और हरिश्चन्द्र घाट पर देर रात घिरते हीं चहल पहल बढ़ रही थी |

*
जारी .....

रहस्यमयी हिमालय 16

दीक्षांत समारोह समाप्त हुआ
महायोगी अभेदानन्द ने बोलना प्रारम्भ किया
“ तंत्र कल्याण का विज्ञान है स्व कल्याण का | तन्त्र के माध्यम से योगी विभिन्न बिजमन्त्रों के द्वारा कुल कुण्डलिनी शक्ति को मूलाधार से उठा कर सहस्त्रार तक ले जाते हैं फिर सहस्त्रार  से पुन : मूलाधार पर ले आते हैं | तंत्र में पञ्च मकार सेवन का विधान है | ये पञ्च मकार हैं – मांस , मध् , मीन , मुद्रा और मैथुन |”
वहां उपस्थित सभी साधक बहुत हीं तल्लीनता से योगी बाबा की बातें सुनते हुए किसी दुसरे हीं लोक में खो गये थे ऐसी ओजस्विता थी उनकी वाणी में |
महायोगी ने आगे कहना प्रारम्भ किया |
"सोमधारा क्षरेद या तु ब्रह्मरंध्राद वरानने|
पीत्वानंदमयास्तां य: स एव मद्यसाधक:||
महायोगी ने रुद्रयामल तन्त्र का ये श्लोक सुनाया | फिर इसके बाद इसका अर्थ उन्होंने इस प्रकार बताया |
“जिह्वा मूल या तालू मूल में जिह्वाग्र ( जीभ का अगला भाग ) को सम्यकृत करके ब्र्ह्मारंध्र ( सिर के चोटी से ) से झरते हुए आज्ञा  (भ्रू मध्य ) चक्र  के चन्द्र मंडल से हो कर प्रवाहमान अमृतधारा को पान करने वाला मद्य साधक कहा जाता है |” 
 जिह्वाग्र ( जीभ का अगला  भाग ) को तालू में लगाना हीं खेचरी मुद्रा कहलाता है ( साधक बिना किसी योग्य गुरु के इस अभ्यास को न करें क्योंकि अमृत के साथ विष का भी स्त्राव उसी स्थान से होता है इसमें गड़बड़ी नहीं होनी चाहिए )
यह वास्तविक मद्यपान कहलाता है |”
एक साधक ने पूछा
“ आज कल के साधक जो बाहरी  मदिरा पान करते हैं क्या ये उचित है मेरे प्रभु |”
महायोगी ने कहना प्रारम्भ किया
“ बाहरी मदिरा पान का भी एक साधक के दृष्टिकोण से महत्व है | कुण्डलिनी शक्ति के उर्ध्वगमन होने पर भारी मात्रा में उर्जा का बहाव शरीर में होता है जो कभी कभी सच्चे साधकों के लिए असहनीय हो जाता है इसी उर्जा के वेग का  प्रभाव कम मह्शूश हो इसलिए मदिरा के माध्यम से  मस्तिष्क को शिथिल करने के लिए यदा कदा उच्च किस्म के साधकों को मदिरापान करना पड़ता है | स्मरण रहे भोग के लिए मदिरापान करना पाप है | औषध रूप में इसका प्रयोग किया जाता है |
सभी तन्त्र साधकों को ये स्मरण रखना चाहिए देखा देखी बिना सोचे समझे तन्त्र मार्ग का हावाला दे कर कभी भी मदिरापान न करें हाँ जब साधना के क्रम  में आवश्यकता मह्शूश हो तब गुरु आज्ञा से हीं बाहरी मदिरा का पान करें |
किन्तु फिर भी साधक को ये प्रयास करना चाहिए कि बाहरी मदिरापान की आवश्यकता न हीं पड़े |
वास्तविक मदिरापान तो ब्रह्मारन्ध्र से गिरते हुए  अमृत को पीना हीं है इस मदिरापान के आनन्द को वर्णन नहीं किया जा सकता |”
योगी बाबा ने समझाया |
आगे योगी बाबा ने कहा
“ आम व्यक्ति एवं सभी जीवों में  जो अमृत ब्रह्मरन्ध्र के बिंदु से  क्षरित होता है वही मूलाधार में आ कर काम उर्जा का निर्माण करता है जिससे सृष्टि के सृजन का कार्य होता है | किन्तु हमारे पूर्वज योगियों ने ध्यान के द्वारा अपने स्वयं के शरीर में प्रवेश कर इसके मर्म को इसके विज्ञान को समझा और युक्तिपूर्वक  एक नए विज्ञान का आविष्कार किया | योगियों के स्व साधना के क्षेत्र में जो भी अविष्कार हुए वे सभी ध्यान की गहरी अवस्था में हुए इसलिए वर्तमान विज्ञान को इसे पकड पाना कठिन है |”
महा योगी के इस ओजमयी ज्ञान का पान वहां उपस्थित सभी साधक तल्लीनता पूर्वक कर रहे थे |  

रहस्यमयी हिमालय - 15

हिमालय का दिव्य वातावरण | चारो  तरफ  बर्फ  से  ढके ऊँचे  ऊँचे  पर्वत | चारो  तरफ  की  हवाओं  में  एक  दिव्य  सुगंध  घुली  हुई | मंद मंद  बहता  समीर | कुल  मिलाकर  वातावरण  को  दिव्य  बना  रहे  थे  ऐसा  प्रतित  हो  रहा  था  जैसे मन  कह उठे   स्वर्ग  यही  तो  है  |
बर्फ  से आच्छादित एक पर्वत  में  स्वामी ब्रह्मानन्द  की गुफा | गुफा में एक  आसन  पर स्वामी  ब्रह्मानन्द  विराज  रहे  थे | गुफा  में  मंद  मंद प्रकाश  बिखरी हुई थी | शीत या उष्णता के प्रभाव से यह गुफा प्रभावित नहीं था ना तो वहां अत्यधिक ठंढ थी न हीं अत्यधिक गर्मी |  निचे विभिन्न आसन  बिछा कर  दस  बारह  साधक बैठे  हुए थे | स्वामी  ब्रह्मानन्द  उन  साधकों  के  साथ किसी  गहन विषय पर चर्चा कर रहे थे |
इसी  बीच  महायोगी अभेदानन्द ने  साधक  सच्चिदानन्द , तरुण  साधक  बटुकनाथ  और उस व्यक्ति के साथ गुफा में  प्रवेश किया |
स्वामी ब्रह्मानन्द और महायोगी अभेदानन्द की प्रेमभरी  दृष्टि  आपस  में  टकराई  | दोनों  के  चेहरे  पर मुस्कान उभर  आई | दोनों  ने एक  दुसरे को सर झुका  कर और हाथ जोड़ कर एक दुसरे का  अभिवादन  किया | महायोगी  के  साथ  आये  साधकों ने स्वामी   ब्रह्मानन्द को  शाष्टांग  प्रणाम  किया  वहां  उपस्थित  साधकों  ने  भी  महायोगी  अभेदानन्द को साष्टांग प्रणाम  किया | स्वामी ब्रह्मानन्द  ने आसन  से  उठ कर महायोगी  को  अपने  आसन पर  बगल  में  बैठने  का अनुरोध  किया | महायोगी  उनके  बगल  में  विराजमान  हो  गये  | सभी  साधकों  ने  भी  निचे  अपने अपने स्थान को  ग्रहण  कर  लिया  |
स्वामी ब्रह्मानन्द  ने उस  व्यक्ति  पर  मुस्कुराते  हुए  दृष्टिपात  किया | उनके  चेहरे  पर ऐसे भाव थे  मानो  वे  पूर्व  से हीं उस व्यक्ति  को  जानते  हों |
महायोगी अभेदानन्द   स्वामी ब्रह्मानन्द की ओर  उन्मुख  होते हुए बोल पड़ें
“ कहें  कैसे  याद  किया |”
“कुछ नहीं प्रभु  ये सभी तन्त्र  के  साधक  हैं  और तंत्र  के  क्षेत्र  में  दस  वर्ष  साधना की है | आगे तन्त्र में  और  गहन यात्रा  हेतु ,तन्त्र के  द्वारा परमज्ञान   प्राप्ति हेतु महाविद्या  तारा  और  महाविद्या  बगलामुखी की दीक्षा लेना  चाहते  हैं  | किन्तु मुझे  इनकी प्रकृति  समझ  में नहीं  आ रही इसलिए  इन्हें  दीक्षित नहीं कर पा रहा  | इस  सम्बन्ध मे  मेरा मार्गदर्शन करें |” स्वामी ब्रह्मानन्द  ने कहा |
महायोगी अभेदानन्द  ने उन  साधकों  पर  दृष्टिपात किया और   आँखे  बंद  कर के गहन ध्यान में  चले  गये |
स्वामी ब्रह्मानन्द और  वहां उपस्थित सभी  साधक  यहाँ तक की  वह  व्यक्ति  भी ध्यान की मुद्रा  में  आ गया  और  ध्यान करने लगे | ( जो  ध्यान  में सिद्धस्त  हो  उसके  निकट  बैठ  कर  मात्र  ध्यान  का  अभिनय  भी  अगर  कोई  करे  तो सहज  हीं  बिना  प्रयास  के  ध्यान  लगने  लगता  है  बस  ध्यान  की  ईच्छा  होनी  चाहिए  )
घंटों  ध्यान के उपरान्त महायोगी अभेदानन्द ने   ने आँखें  खोली | उनके साथ ध्यान  कर  रहे  साधकों का  भी स्वत: आँखें खुल गयी | ( अगर  आप  किसी  के  सान्निध्य  में ध्यान  कर रहें  हो  तो ऐसा  होता  है जिसके सान्निध्य में  आप  ध्यान  कर  रहें  है  वे  अगर  ध्यान  से  बाहर आते  हैं  तब उसी समय  आप भी ध्यान  से बाहर  आते  हैं 90 % मामलों  में | शेष  10 % मामलों  में ऐसा  नहीं  होता  बल्कि आगे  भी  ध्यान  जारी  रहता  है  अगर  ध्यानकर्ता  सिद्धस्त  हो  तब | )
आगे  माहयोगी  ने फिर  से उन  साधकों का निरिक्षण किया और उनमे से तीन  साधकों के तरफ इशारा करते हुए कहा
“ ये तीन आगे गति नहीं कर पायेंगे इनके कर्म कटने अभी बाकी हैं इन्हें और साधना  की आवश्यकता  है | ये तीन अभी  दीक्षा  के  काबिल  नहीं  हैं |”
“ जी  महराज  जी इन तीनों  में  से एक  की  प्रकृति  तो  मुझे  पकड  में  आ रही  थी  किन्तु  इन  दोनों के  बारे  में  आश्वस्त  नहीं  था ध्यान  में  इनकी सूक्ष्म प्रकृति अयोग्यता के संकेत अवश्य  दे रहे थे किन्तु  थोडा अस्पष्ट था | इसलिए  आपको  कष्ट  दिया |” स्वामी ब्रह्मानन्द  ने  कहा |

कुछ समय उपरान्त स्वामी ब्रह्मानन्द के द्वारा महायोगी अभेदानन्द के समक्ष शेष नौ साधकों को दीक्षित किया गया जिसमे से पांच को बगलामुखी महाविद्या की दीक्षा दी गयी शेष चार  को महाविद्या तारा की |

Wednesday, 22 February 2017

रहस्यमयी हिमालय 14 Secret Himalaya 14

वह व्यक्ति आँखें बंद करके गहन चिन्तन में चला गया | बचपन से अभी तक की कुछ स्मृतियाँ मानस पटल पर उभरने लगी | वह अपने भीतर हीं अनुसंधान करने लगा | वह टटोलने की कोशिश करने लगा कि बचपन से ले कर अभी तक कौन सी चीज उसमे नहीं बदली है |
घंटों अंदर टटोलने के बाद सहसा उसके मन में एक बात कौंधी | अरे ! अपने भीतर यह टटोल कौन रहा है | बचपन से ले कर आज तक की घटनाओं को मन के पटल पर देख कौन रहा है | अरे ! यह तो मैं ( अहंकार और मन युक्त नहीं ) हूँ | मैं हीं तो हर क्षण मौजूद हूँ साक्षी बन के सारी घटनाओं का | जीवन के उतार चढाव को यह मैं हीं देखता रहा | यह मैं मेरे सुख का भी गवाह है और मेरे दुखों का भी | जब तक मेरा शरीर जागृत रहता हूँ यही हर क्षण मौजूद रहता है | यह बदलता नहीं | यह सब कुछ देखता रहता है किन्तु इसे मैं ( अहंकार और मन युक्त ) देख नहीं पाता | यही तो है अपरिवर्तनशील | सुखों और दुखों , जीवन के प्रत्येक घटनाओं का यही तो गवाह है | यह देखता रहता है बिना प्रभावित हुए भावनाओं या किसी अन्य गुणों के | ( यह एक ध्यान प्रयोग भी है इसे करें )
वह प्रसन्न था | चिन्तन चल रहा था |

कुछ देर बाद उसकी आँखें खुली | उसने योगी बाबा पर दृष्टिपात किया प्रसन्नता पूर्वक मानों कोई खजाना उसके हाथ लगा हों |
महायोगी अभेदानन्द भी ध्यान से बाहर आ गये | और मुस्कुराते हुए उसे देखा | बिना उसके कुछ बोले हीं योगी बाबा ने कहा
हाँ तुम ठीक हो यह तुम्हारे अंदर की शास्वतता हीं है जो कभी नहीं बदलती जिसे भाषा की अभाव में अभी भी मैं कह रहे हो वही कभी नहीं बदलता | किन्तु यह अहसास जो तुम कर रहे हो यह बिलकुल छोटा अहसास है इस कड़ी को पकड कर तुम उस विराट में प्रवेश कर सकते हो | यह अहसास तो सिर्फ समुद्र किनारे की सीपियाँ हैं असली रत्नों का संसार तो आगे की यात्रा तय करने पर प्राप्त होगा |”
उसकी आँखें महायोगी अभेदानन्द के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रही थी |
तभी गुफा के अंदर बारह तेरह वर्ष के एक तरुण ने प्रवेश किया |
योगी बाबा ने उससे मुखातिब होते हुए उससे पूछा हाँ बटुकनाथ कहो कैसे आना हुआ |”
उस तरुण का नाम बटुकनाथ था उसने कहा कुछ नहीं प्रभु वह आपको पूज्य गुरु स्वामी ब्रह्मानन्द ने याद किया है |”
हाँ वह तो महायोगी ब्रह्मानन्द के मानसिक तरंगों से मुझे ये सूचना मिल चुकी है किन्तु तुम यहाँ ! योगी बाबा ने कहा
प्रभु आपके दर्शनों की अभिलाषा भी हो रही थी सोचा चल कर दर्शन कर लूं |” बटुकनाथ के ये शब्द निकलते हुए उसकी आँखें गीली थी |
किन्तु कुछ हीं समयोपरांत मैं तो स्वयं महा योगी ब्रह्मानन्द के समक्ष उपस्थित होने हीं वाला था |
देखो तुम्हें आकाश गमन विद्या सिद्ध हो चूका है इसका ये मतलब नहीं कि तुम मात्र मानसिक आनन्द और जिज्ञासा वश इसका उपयोग करो |”
योगी बाबा ने थोड़ी कठोरता से मीठी झिडकी लगाईं बटुकनाथ नामक उस तरुण सन्यासी को |
योगी बाबा ने उस व्यक्ति के तरफ उन्मुख होते हुए कहा
यह तरुण साधक बटुकनाथ है | आठ वर्ष की उम्र में यह मुझे मिला था हिमालय के जंगलों में | यह राह भटक कर वीरान जंगल में खो चूका था | क्रन्दन करते हुए अवस्था में मैंने इसे जंगलों में पाया था | इसके माता पिता नहीं हैं | अपने जीवन के पांच वर्षों में इसने काफी साधनाएं की हैं | बटुक भैरव की इसपे बहुत अधिक कृपा है इसलिए इसका नाम बटुक नाथ रख दिया गया |
चलो चलते हैं |”

योगी बाबा ने उस व्यक्ति के तरफ उन्मुख होते हुए कहा

Saturday, 4 February 2017

Rahasyamayi Himalaya ( Audio Video ) रहस्यमयी हिमालय ( ऑडियो विडिओ )

अभी तक आपने रहस्यमयी हिमालय श्रीन्खला पढ़ा आगे की कड़ियाँ भी जल्द प्रकाशित की जायेगी |
लीजिये अब रहस्यमयी हिमालय श्रीन्खला सुनें Youtube पर

Thursday, 20 October 2016

रहस्यमयी हिमालय 11

वह व्यक्ति योगी बाबा अभेदानन्द की ओर उन्मुख हुआ | उसने बाबा से पूछा |
“ बाबा हम पूर्व जन्म से इस जन्म में आते कैसे है जबकि हमारा शरीर तो समाप्त हो चूका होता है |”
योगी बाबा ने प्रेम से समझाते हुए कहा “ हमारा स्थूल शरीर जो इस आँख से दिखाई देता है वह तो मर जाता है किन्तु हमारा  सूक्ष्म शरीर नहीं मरता और हमारा मन इसी सूक्ष्म शरीर के माध्यम से एक शरीर से दुसरे शरीर की यात्रा करता रहता है | मन हमारे संस्कारों का वाहक बनता है | आत्मा अमर है क्योंकि यह परमात्मा का हीं अंश है , इस आत्मा के उपर कई आवरण होते हैं | आत्मा के उपर दृश्य आवरण तो हमारा , रक्त मांस मज्जा , अस्थि  चमड़े से निर्मित शरीर है | आत्मा के और भी कई आवरण हैं जो अनुभव में आते हैं | हमारा मन भी आत्मा का आवरण हीं है | इस प्रकार बुद्धि , ज्ञान , आनन्द  अहंकार आदि आत्मा के उपर अदृश्य  आवरण  होते हैं | कई बार हम ये सोचते हैं मैं हूँ यह मैं अहंकार रूपी  आवरण है |
“ भगवन यह सूक्ष्म शरीर क्या है |” उसने बाबा से पूछा
योगी अभेदानन्द ने आँखें बंद की और हाथ हवा में लहराया | उनके हाथों में कुछ अनाज के  दाने थे | उन्होंने उसे दिखाते हुए पूछा “ यह क्या है |”
“बाबा यह तो गेंहू के दाने हैं |”
बाबा ने उसके सर पर हल्की चपत लगाईं और कहा  “ अब देख क्या है |”
उसने आश्चर्य से भरते हुए कहा “ बाबा गेंहूँ के चारो तरफ तो रंग विरंगे प्रकाश की किरणें नजर आ रहीं हैं |”
योगी  बाबा ने फिर से हाथ हवा में लहराया इस बार अनेकों किस्म के अनाज के दाने उनके हाथों में थे | उन्होंने उसे दिखाते हुए उससे पूछा  “ क्या नजर आता है |”
“ बाबा इन अनाज दानों के साथ झिलमिल करते हुए प्रकाश के किरण नजर आ रहें हैं |” उसने कहा
“ तुम्हारा , हमारा सभी का शरीर इन अन्न से बने हुएं हैं इसलिए कहा गया है अन्नं ब्रह्मा | हमारा  तुम्हारा जो शरीर है यह अन्न से बना हुआ है | अन्न से वीर्य और रज बने होते हैं जिससे  इस शरीर का निर्माण होता है | इस अन्न से  बने हुएस्थूल  शरीर को अन्नमय कोश कहते हैं | इस  अन्न से बने शरीर का महत्व यह है कि परमात्मा अनुभव में इसका अहम भूमिका  है | जिस प्रकार से नारियल के फल में अनेक आवरण होते हैं , ये आवरण कई भाग होते हैं जैसे छिलका , सख्त भाग उसके अंदर नारियल का गूदा और फिर उसके अंदर नारियल का पानी | ठीक उसी तरह ये शरीर जो अन्न से बना है बाहरी छिलका और सख्त खोपडा समझो इसे नारियल का | इसके अंदर फिर मन का कोश है , प्राण का  कोश है , विज्ञान का कोश जो की आत्मा है और उस आत्म तत्व की प्राप्ति का आनन्द हीं आनन्दमय  कोश है | अगर बाहरी छिलका और सख्त भाग न हो तो नारियल की कल्पना कर सकते हो क्या तुम ठीक उसी तरह शरीर का भी कार्य है |” बाबा ने समझाते हुए कहा |
“  मृत्यु के बाद तो तुम्हारा शरीर यहीं रह जाता है किन्तु सूक्ष्म शरीर जो अन्नमय शरीर का हीं सूक्ष्म रूप है नष्ट नहीं होता | यह सूक्ष्म शरीर अन्न के उस भाग से बना हुआ है जो तुमने प्रकाश रूप में देखा | अन्न के बनने की भी जटिल क्रिया है यह अन्न भी  पृथ्वी , प्रकाश ( अग्नि ) , जल , वायु और आकाश से हीं बना हुआ है | सूक्ष्म शरीर में इन्हीं दो तत्वों  प्रकाश (अग्नि ) और आकाश की मात्रा प्रबल होती है बाकी तीन तत्वों की मात्रा अत्यंत अत्यंत सूक्ष्म होती है | इन्हीं सूक्ष्मतम तत्वों के कारण सूक्ष्म शरीर जो मृत शरीर से निकला होता है कभी कभी लोगों को प्रेत रूप में दृश्य हो जाता है और कई बार इनकी आवाज़ भी सुनाई दे जाती है | इन्हीं तत्वों के माध्यम से आत्मा मन के साथ दुसरे शरीर में प्रवेश करता है | सूक्ष्म शरीर का आकार भी स्थूल शरीर के जितना हीं होता है और अदृश्य होता है | बिना साधना के इसे देखा और अनुभव नहीं किया जा सकता | सनातन धर्म  में शरीर को अग्नि में समर्पित करने का  कारण है प्रथम तो अग्नि स्थूल शरीर को जला कर नष्ट कर देती है और सूक्ष्म तत्व को मुक्त कर देती है अगली यात्रा हेतु | सूक्ष्म शरीर को परिभाषित करना हो तो हम कह सकते हैं कि सूक्ष्म शरीर मन , प्रकाश , आकाश वायु और आत्मा का जोड़ है | फिर भी इस तरह यह  पूर्णतया  परिभाषित नहीं होता यह अनुभव से हीं समझा जा सकता है | 

 इस ज्ञान के द्वारा वह व्यक्ति एक अलग हीं आयाम में छलांग लगा  चूका था |

Saturday, 4 June 2016

How to calm mind during meditation. ध्यान के दरम्यान मन शांत कैसे करें

मन  बहुत  चंचल है | जब  ध्यान  करने  बैठो उसी वक्त यह ज्यादा परेशान करता  है शांत हीं नहीं होता |  इसका  ईलाज है  कारगार  ईलाज  ! आखिर मन  के उपर  भी  उसका  बाप  आत्मा जो  बैठा  है  ईलाज  कैसे नहीं  मिलेगा  | ऐसे में अधिकाँश साधक आत्म सुझाव ( Auto suggestion ) का सहारा लेते हैं | जैसे की मन  हीं मन वे  दुहराते हैं ” मेरा मन  शांत हो  रहा  है .............मेरा मन  शांत  हो  रहा  है ........|” लेकिन कई बार  यह भी कार्य  नहीं करता तब क्या करें ? ऐसे में एक रामबाण ईलाज है !
शान्ति  से सुखासन में बैठ  जाएँ |
रीढ़ की हड्डी  सीधी  तनी हुई नहीं |

तीन बार  अनुलोम  विलोम प्राणायाम  कर  लें ( नहीं भी करेंगे तो चलेगा )
अब एक  गहरी  लम्बी सांस अंदर खींचते हुए ॐ ................का उच्चारण करें साँसों को छोड़ते हुए |
फिर  एक  बार ॐ .............................
ॐ  का उच्चारण करते रहें |
आपके ॐ के उच्चारण  से शरीर में स्पंदन होने लगेगा |
इस  स्पंदन को मह्शूश करें |
ॐ का उच्चारण सिर्फ मुंह से नहीं हृदय से करें |
अपने अहं को ॐ में विलीन कर दें |
शरीर और मन में ॐ के प्रकम्पन को मह्हूश करें |
आप  देखेंगे आपका मन  शांत  हो  गया है |

ॐ ॐ ॐ