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Thursday, 9 June 2016

Manipura chakra 2 मणिपुर चक्र 2

       बौद्ध तथा अनेक तांत्रिक परम्पराओं में कुण्डलिनी का वास्तविक जागरण मणिपुर चक्र से हीं माना जाता है न कि मूलाधार से |कई तांत्रिक परम्पराओं में मूलाधार तथा स्वाधिष्ठान की चर्चा तक नहीं की गयी है | क्योंकि उनके अनुसार ये चक्र पशु जीवन के उच्च स्तरों से सम्बन्धित है | मतलब हुआ पशु जीवन में चक्र  जागरण  का सबसे ऊँचा स्तर स्वाधिष्ठान चक्र है , पशुओं के लिए सहस्त्रार जागरण दुर्लभ है | यहीं इसी बात से  मानव जीवन और मानवीय शरीर की महता सिद्ध होती है | और हमें समझ में आता है कि  मानवीय शरीर क्यों आवश्यक है | तो प्रथम जागरण का केंद्र मणिपुर हीं है ऐसा इसलिए कि इस चक्र के जागरण के बाद अधोगामी होने की संभावना नहीं रहती | यहाँ तक जिस किसी भी साधक का चक्र जागृत हो गया हो तो उसके बाद अब कुण्डलिनी निचे नहीं गिर सकती | जबकि स्वाधिष्ठान तक पहुँच कर कुण्डलिनी के फिर से निचे गिरने की संभावना रहती है | 

मणिपुर तक जागरण पहुँचने के बाद जागरण सुनिश्चित होता है | मणिपुर में सजगता को स्थिर रखना तथा जागरण को जारी रखना थोडा कठिन होता है | इसलिए साधक को यहाँ पहुँच कर साधक को अपने प्रयास में लगनशील होना तथा दृढप्रतिज्ञ होना आवश्यक है | यदि सांसारिक कार्यों को करते हुए भी आपका जीवन अध्यात्मिक है , आप वगैर किसी संकोच के रूचि लेते हुए योगाभ्यास और ध्यान करते हैं | और उच्चतर जीवन के प्राप्ति हेतु गहरी प्यास है और इसके लिए गुरु की तलाश कर रहें हैं तो अब आपकी कुण्डलिनी मूलाधार में नहीं है | बल्कि वह एक उच्च केंद्र मणिपुर तक पहुँच गयी है |
       आगे जारी .................
ध्यान करते रहें अपने नित्य दैनिक के कर्मों में से सिर्फ  पैंतालिस मिनट , एक घंटा निकाल कर आप ध्यान करते हैं तो आपको स्वाद आने लगेगा , रस मिलने लगेगा अध्यात्म का | और स्वाद आने भर की देर है फिर उसके बाद तो बाकी कार्य परमात्मा सम्पन्न करेगा | ॐ के जाप से ध्यान का रस मिलना प्रारम्भ हो जाता है |

ॐ 

Tuesday, 7 June 2016

Manipura chakra मणिपुर चक्र

मणिपुर दो शब्दों से बना है मणि और पुर मतलब हुआ मणियों का नगर | तिब्बत के परम्परा में इसे मणिपद्म भी कहते हैं जिसका अर्थ हुआ मणियों का कमल | मणिपुर सक्रियता , शक्ति ,इच्छा तथा उपलब्धियों का केंद्र है | इसकी तुलना सूर्य के तेज गर्मी व् शक्ति से की जाती है जिसके अभाव में इस धरा पर जीवन की कल्पना संभव नहीं | ठीक उसी तरह मणिपुर चक्र भी विभिन्न अवयवों , संस्थानों तथा जीवन की प्रक्रियाओं को नियमित करते तथा शक्ति प्रदान करते हुए सम्पूर्ण शरीर में प्राण उर्जा के प्रवाह का जिम्मेदार है | 

शक्ति की कमी होने पर यह चक्र एक शक्तिशाली ज्वाला की भाँती न हो कर दहकते हुए एक लाल अंगार की तरह हो जाता है | ऐसी स्थिति में व्यक्ति निष्क्रिय व् शक्तिहीन होता जाता है | ऐसा व्यक्ति व्याधियों व् अवसाद से ग्रस्त हो जाता तथा उसमे प्रेरणा की कमी एवं उतरदायित्वों के प्रति लापरवाही देखने को मिलती है | इसलिए मणिपुर का जागरण न केवल साधक के लिए एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है वरन उनके लिए भी आवश्यक है जो जीवन के सम्पूर्ण आनन्द की अनुभूति हेतु उत्सुक  है |
       कुण्डलिनी का मूल निवास मूलाधार , घर स्वधिस्थान और प्रथम जागरण का केंद्र मणिपुर है |

ॐ सत्यं परम धिमहि !
खूब  ध्यान  कीजिये  ध्यान  करने  से  कोई  हानि  नहीं  होती  बिना  भयभीत  हुए  ध्यान  करें  अगर  गुरु नहीं  हैं  तो  परमात्मा  का हाथ  आपके  उपर  है  इस  भाव  को  दृढ कर के  ध्यान  में  बैठे | परमात्मा  के  लिए  ध्यान  में  आंसू  बहायें  | अच्छा  संगीत  सुनें instrumental बांसुरी  , सितार , जलतरंग , संतूर  आदि |

आगे जारी .................

Thursday, 2 June 2016

swadhisthana chakra 4 स्वाधिष्ठान चक्र – 4

स्वाधिष्ठान का सम्बन्ध स्थूल शरीर में प्रजनन तथा मूल संस्थान से है , परन्तु शारीरिक रूप से यह प्रोटेस्टेंट के स्नायुओं से सम्बन्धित है | स्वाधिष्ठान चक्र रीढ़ के हड्डी के निचे काक्सिस के स्तर पर स्थित है | यह हड्डियों के एक छोटे बल्ब की तरह है जो गुदाद्वार के ठीक उपर है | शरीर क्रियाविज्ञान के दृष्टिकोण से यह पुरुषों और स्त्रियों दोनों के मूलाधार चक्र के अत्यंत नजदीक है |
स्वाधिष्ठान का रंग काला है क्योंकि यह मूल अज्ञान का प्रतीक है | किन्तु पारम्परिक रूप से इसे छ : पंखुड़ियों के सिंदूरी कमल के रूप में चित्रित किया जाता है | हर पंखुड़ी पर बं , भं ,मं , यं ,रं और लं चमकीले रंगों में अंकित है | इस चक्र का तत्व जल है जिसका प्रतीक है – कमल के अंदर एक सफ़ेद अर्ध चन्द्र | यह अर्ध चन्द्र दो वृतों से मिल कर बना है जिनसे दो यंत्रों की संरचना होती है | बड़े वृत्त से बाहर की और पंखुडियां निकलती हुई दिखाई देती है जो भोतिक चेतना का प्रतीक है | अर्ध चन्द्र के अंदर वाले छोटे वृत में उसी  प्रकार की पंखुडियां हैं पर वे केंद्र की और मुड़ी हुई हैं | यह अकार विभिन्न कर्मो  के भंडार गृह का प्रतीक है | 

अर्ध चन्द्र के अंदर इन दो यंत्रों को सफ़ेद रंग का एक मगर अलग अलग करता है | यह मगर अचेतन जीवन की सम्पूर्ण मनोलीला का माध्यम है अर्थात सुप्त कर्मों का प्रतीक है | मगर के उपर स्वाधिष्ठान चक्र का बीज मन्त्र ‘ वं ’ अंकित है |
       मंत्र के बिंदु के अंदर देव विष्णु और देवी राकिनी का निवास है | विष्णु के चार हाथ हैं और उनका रंग चमकीला है | उनके वस्त्र पीले एवं अत्यंत हीं सुंदर हैं | राकिनी का रंग नीले कमल की तरह है एवं वे दिव्य वस्त्र एवं आभूषणों से सजी हुईं हैं | अपने उपर उठे हाथों में उन्होंने अनेक शस्त्र धारण कर रखें हैं | अमृतपान करने से उनका मन  आनन्दित है | वे वनस्पतियों की देवी हैं | स्वाधिष्ठान चक्र का सम्बन्ध वनस्पतियों से है | अत : कुण्डलिनी  के साधक को निरामिष हीं रहना चाहिए |
       स्वाधिष्ठान का लोक भुव: है जो अध्यात्मिक जागृति का मध्य स्तर है | इस चक्र से स्वाद की तन्मात्रा या संवेदना सम्बन्धित है | ज्ञानेन्द्रियाँ जिह्वा , कर्मेन्द्रियाँ यौन अवयव ,किडनी तथा मूत्र संस्थान हैं | स्वाधिष्ठान की मुख्य वायु व्यान है जो पुरे शरीर में स्थित है | स्वाधिष्ठान और मणिपुर चक्र प्राणमय कोष के निवास स्थान हैं |

       स्वाधिष्ठान पर ध्यान लगाते रहने से मनुष्य अपनी आंतरिक दुष्प्रवृतियों जैसे काम , क्रोध , लोभ आदि से तुरंत मुक्त होने लगता है | उसकी वाणी अमृत की तरह तथा काव्यमय एवं ज्ञानयुक्त होती है | 

Tuesday, 31 May 2016

स्वाधिष्ठान चक्र 3

स्वाधिष्ठान को व्यक्ति के अस्तित्व का अधार माना गया है | मष्तिष्क में इसका रूप अचेतन मन है ,जो संस्कारों का भंडारगृह भी है | ऐसा कहा जाता है कि प्रत्येक कर्म , पिछला जन्म , पिछले अनुभव , मानव व्यक्तित्व  का सबसे बड़ा पक्ष अचेतन सभी का प्रतीक स्वाधिष्ठान चक्र को माना जाता है | अचेतन मन संस्कारों का जमा होने का केंद्र है | तथा यही इस चक्र के स्तर पर अनुभव की जानेवाली अनेक नैसर्गिक अनुभूतियों का उद्गम भी है |

       तन्त्र में पशु तथा पशु का नियन्त्रण जैसी एक धारणा है | संस्कृत में पशु का अर्थ है जानवर और पति का मतलब है नियंत्रक | पशुपति का अर्थ है – सभी पाशविक प्रवृतियों का नियन्त्रणकर्ता | यह भगवान शिव का एक नाम तथा स्वाधिष्ठान चक्र का एक गुण भी है | पौराणिक मान्यता के अनुसार पशुपति पूर्णत: अचेतन हैं | मानव विकास के प्रथम स्तर पर यह मूलाधार चक्र तथा पाशविक प्रवृतियों का नियन्त्रणकर्ता है |
जब शक्ति स्वाधिष्ठान चक्र में प्रवेश करती है तो हमारे अचेतन स्थिति का एक शक्तिशाली अनुभव होता है | मतलब अचेतन की चीजें उभर उभर कर सामने आने लगती हैं | अचेतन मन में संसार और कर्म बीज रूप में सुप्त पड़े रहते हैं |

आगे जारी है .....

स्वाधिष्ठान चक्र 2

आगे .................
कुण्डलिन के स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित होने पर सभी अवशेष कार्य और नकारत्मक संस्कार अभिव्यक्ति के माध्यम से बाहर निकल जाते हैं | इस समय क्रोध , डर , यौन विकृतियाँ तथा अनेक प्रकार की इच्छाएं प्रकट हो सकती है सभी प्रकार की तामसिक वृतियां तन्द्रा . अकर्मण्यता तथा निराशा आदि का प्रकटीकरण भी संभव है व्यक्ति आलसीपन का शिकार हो सकता है बहुत ज्यादा निद्रा से ग्रसित हो सकता है ( किन्तु इसका मतलब ये नहीं की आलसी और ज्यादा सोने वालों का स्वाधिष्ठान  चक्र जाग गया है ) | ऐसे समय में  विचलित होने की बात नहीं है | ऐसा समय  जब आवे तब मात्र साक्षी हो कर अपने भीतर के दुर्गुणों को देखना चाहिए कर्ता नहीं बनना चाहिए | इसलिए समय समय पर मैं ध्यान प्रयोग करने को कहता हूँ और तरह तरह का ध्यान विडियो के माध्यम से भी प्रेषित  करता रहता हूँ | खैर ..... प्रत्येक साधक व  संत को इस विशिष्ट अनुभूति के स्तर को जो  जीवन के रहस्यों के अंतिम विस्फोट की भाँती होता है इसे पार करना हीं पड़ता है | 

गुरु की कृपा , संकल्प शक्ति , अध्यात्मिक मार्ग में लगनशीलता , लक्ष्य के प्रति सजगता व  शोधक अनुभूतियों को ठीक से समझ कर  इस मार्ग की समस्याओं को झेला जा सकता है | और असावधानी होने पर डरने की बात नहीं सिर्फ होगा ये की कुण्डलिनी शक्ति फिर से मूलाधार चक्र पर आ जायेगी गिर कर | ऐसे स्थित में वैराग्य भाव बहुत मदद करता है | जैसे मन में संकल्प चलना चाहिए की आज तक भोगों को भोग कर तुमने क्या पाया और निष्कर्ष मन दिखा देता है की कुछ भी नहीं | इसलिए ऐसी  स्थिति में  तीव्र वासना का तूफ़ान जब आये तब वैराग्य भाव को मजबूत करें |
पुन : चर्चा होगी
ध्यान के विडियो के लिए यूट्यूब  लिंक 

स्वाधिष्ठान चक्र

स्वाधिष्ठान चक्र 
संस्कृत में स्व का अर्थ होता है अपना और अधिष्ठान का अर्थ होता है रहने का स्थान | स्वाधिष्ठान का शाब्दिक अर्थ हुआ अपने रहने का स्थान | मूलाधार के ठीक उपर का चक्र स्वाधिष्ठान चक्र है | कुछ कुण्डलिनी विद्वानों का मानना है कि पहले कुण्डलिनी स्वाधिष्ठान चक्र में स्थित थी किन्तु बाद में मूलाधार में गिर गयी | प्राचीन काल सतयुग , त्रेता और द्वापर युगों के मनुष्यों की कुण्डलिनी स्वाधिष्ठान में थी | अब इसमें कितनी सच्चाई है ये पता नहीं किन्तु इस चक्र का नाम तो कुछ ऐसा हीं संकेत देता है | तो एक मान्यता यह भी है कि अगर कुण्डलिनी स्वाधिष्ठान पर पहुँच गयी हो तो पुन : मूलाधार पर भी आ सकती है | दैनिक जीवन और साधना में एकाएक खूब आनन्द और फिर दुःख का यह भी एक कारण है | देखो तुम साधना करो न करो किन्तु कुण्डलिनी तुम्हारे नित्य जीवन में अपने अनुभव देती रहती है जरूरत है जागरूक होने का | संगीत में तुम खूब तल्लीन हो सारा सुध बुध खो चुके हो तो उस घड़ी तक कुण्डलिनी मूलाधार पर फन उठा कर ( सजग हो कर ) कर स्वाधिष्ठान की ओर देख रही होती है और परिणाम आनन्द | अपने दैनिक जीवन में सजग होने पर ये अनुभूतियाँ मह्शूश की जा सकती है | अब कुछ अच्छे वक्ता है जिनको सुन कर जनता मुग्ध हो जाती है उस वक्त वक्ता का विशुद्धि चक्र सजग होने लगता है , ध्यान रहे स्वाधिष्ठान चक्र जाग नहीं जाता सिर्फ थोडा सजग होता है |
आगे इस पर और बातें करूँगा

ध्यान निर्देश के लिए यूट्यूब विडियो लिंक