Friday, 17 July 2015

समय गतिशील नहीं बल्कि स्थिर है

आमतौर पर धारणा है कि समय परिवर्तनशील है समय चलयमान , समय गतिशील है ! लीजिये आज मैं आपके इस धारणा का खंडन करता हूँ | यह पूर्णत :गलत है कि समय गतिशील है , बल्कि सच्चाई यह है कि समय बिलकुल स्थिर है | कैसे ? हम समय को कैसे परिभाषित करते हैं मिनट दिन साल आदि से , हम कहते हैं अभी सुबह हुआ है अभी शाम हुआ है , कल बीत गया या कल आने वाला है | या कहते हैं वर्षों बीत गए | या फिर कहते हैं आज सब बदल गया है समय बदल गया है |

दरअसल समय का निर्धारण सूर्य और पृथ्वी की गति से करते हैं , तो क्या इस दरम्यान सचमुच समय गतिशील रहता नहीं बिलकुल नहीं बल्कि सच्चाई यह है कि पृथ्वी गतिशील होती है और उसी के गति के आधार पर हम समय का निर्धारण करते हैं , समय तो स्थिर होता है | क्या पृथ्वी की गति हीं समय है नहीं यह भी सत्य नहीं है पृथ्वी की गति वृताकार है , सुबह होता है , दोपहर फिर शाम , रात्री तथा फिर सुबह इस प्रकार सर्किल चलता रहता है |
हम कहते हैं आज हम जवान हैं कल बच्चे थे और कल बूढ़े हो जायेंगे समय एक समान नहीं है | भाई ये परिवर्तन समय का नहीं बल्कि आपके भीतर का है शारीरिक परिवर्तन | हम कहते हैं कल जो गरीब था आज करोडपति अमीर है फलां का समय बदल गया नहीं नहीं फलां का समय नहीं बल्कि आर्थिक स्थिति बदल गयी |
अब सवाल यह है कि समय क्या है तो जबाब है .....
समय परमात्मा है जो स्थिर है समय आपके भीतर की आत्मा है |
ये विचार मेरी आत्मानुभूति है इस पर अपने विचार अवश्य दें |

Tuesday, 2 June 2015

आज्ञा चक्र -6 ( अंतिम भाग )

चक्रों के जागरण के पूर्व हमारी स्थिति भ्रमित रहती है | आसक्ति , द्वेष और इर्ष्या , दुःख और सुख , जीत और हार तथा और भी अनेक क्षेत्रों में हमारे दृष्टिकोण दोषपूर्ण होता है तथा मान्यताएं गलत होती है | यद्धपि आसक्ति उपर से दिखाई नहीं देती फिर भी वह हमारे भीतर है | विश्वाश करें हमारा मन एक सिमित दायरे में कार्य कर रहा है और हम उससे परे  नहीं हो सकते | जिस प्रकार रात्री में हम एक स्वप्न देखते हैं और स्वप्न में होने वाला अनुभव भी अपनी मन:स्थिति से सम्बन्धित है ठीक उसी तरह हम दिन में भी स्वप्न देख रहे हैं और यह भी अपने वर्तमान मन:स्थिति से सम्बन्धित है   | ठीक उसी प्रकार जब आज्ञा चक्र का जागरण होता है तो हम स्वप्नावस्था से जागृत अवस्था में आते हैं | तब  इस वर्तमान जीवन की वास्तविकता  और कारण तथा प्रभाव के बीच के सम्बन्ध को समझने लगते हैं |

अपने जीवन के सम्बन्ध में कारण और प्रभाव के नियम को समझना बहुत हीं आवश्यक है , अन्यथा हम निराश होने लगते हैं तथा जीवन की दुखद घटनाओं के प्रति मन दुखी होने लगता है | मान  लें एक बच्चे का जन्म होता है और तुरंत उसकी मृत्यु हो जाती है | अब सोचे ऐसा क्यूँ हुआ यह पहेली प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति के दिमाग में आएगी है की नहीं ! यदि जन्म के तुरंत बाद  बच्चे को मरना हीं था तो बच्चे ने जन्म क्यों लिया ? आप इस तथ्य को तभी समझ सकते हैं जब आप कारण और प्रभाव के नियमों को समझते हैं |
कारण और प्रभाव तुरंत  होने वाली घटनाएँ नहीं है , प्रत्येक कार्य कारण और प्रभाव दोनों हैं |यह वर्तमान जीवन एक प्रभाव है लेकिन इसका कारण क्या था ? आपको इसे खोजना है , तभी आप कारण और प्रभाव के बीच के सम्बन्ध को समझ सकते हैं | आज्ञा चक्र के जागरण के पश्चात हीं इन नियमों को जाना जा सकता है | उसके बाद  जीवन के प्रति विचारधारा तथा दार्शनिक दृष्टिकोण बदल जाता हैं  | तब किसी भी घटना से व्यक्ति दुष्प्रभावित नहीं होता और न हीं जीवन की आवंछित घटनाएँ उसे परेशान करती हैं | जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति सहज रूप से भाग लेता है परन्तु वह मात्र द्रष्टा हीं रह जाता है | जीवन एक तेज़ करेंट की तरह बहता रहता है और व्यक्ति उसके धरा के प्रति समर्पित हो कर बहता चला जाता है ||
एक बार आज्ञा चक्र के जागरण के बाद सहस्त्रार तक पहुंचना कठिन नहीं होता | ठीक उसी तरह जैसे आप दिल्ली पहुँच गयें फिर इंडिया गेट पहुंचना आपके लिए कठिन नहीं होगा | यहाँ आज्ञा चक्र को दिल्ली समझें तथा सहस्त्रार  को इंडिया गेट | इसी कारण वश मैंने आज्ञा चक्र पर इतनी श्रीन्ख्लायें प्रस्तुत की है ताकि आज्ञा चक्र के महत्व को समझा जाए | किसी और चक्र से शुरुआत के वनिस्पत आज्ञा चक्र से शुरुआत करना ज्यादा आसान और फलदायी होगा |
इति शुभ !
आगे  बिंदु  पर एक दो लेख  होगा  !
फिर  
आगे आज्ञा चक्र सम्बन्धित सरल  ध्यान प्रयोग  प्रस्तुत करूँगा कुछ लिखित में तथा कुछ Mp3 फोर्मेट में इसलिए ब्लॉग पर निरंतर बने रहें |