Saturday, 30 May 2015

आज्ञा चक्र – 5

आज्ञा प्रमुख रूप से मन का चक्र है जो चेतना के उच्च अवस्था का प्रतिनिधित्व करता है | जब आप किसी चक्र पर ध्यान करते हैं चाहे मूलाधार , स्वधिस्थान या मणिपुर या फिर किसी लक्ष्य पर तब आज्ञा चक्र अवश्य प्रभावित होता है | ये सत्य है कि यह प्रभाव एकाग्रता के स्तर पर कम या ज्यादा हो सकता है | हमारे मानसदर्शन या स्वप्न में जो भी हमें दिखाई पड़ता है उसका माध्यम आज्ञा चक्र हीं है कैसे ! इस कैसे का  जबाब आप पर छोड़ता हूँ ताकि अगर आप इस स्तर पर प्रयासरत हैं तो इस कैसे प्रश्न के उतर में आपको बहुत कुछ प्राप्त हो सकता है आवश्यकता मनन करने की है इसलिए ढूंढें जबाब | यदि आप खाते , सोते  या बात करते हुए सजग ( Aware ) नहीं हैं तो आपका आज्ञा चक्र जागृत नहीं है | किन्तु अगर आप बात कर रहें हैं और आपको मालूम है कि आप बात कर रहें हैं तो यह सजगता आपके  आज्ञा चक्र के कारण है   |  
       जब आज्ञा चक्र विकसित हो जाता है तब आपको वगैर इन्द्रियों ( पञ्च इन्द्रियां यथा आँख , नाक , कान , जिह्वा तथा त्वचा ) के हीं ज्ञान प्राप्त होने लगता है | क्या ये काल्पनिक बात है ! एक प्रयोग करें आँखें बंद कर लें और किसी वस्तु , व्यक्ति या स्थान की कल्पना करें कल्पना में ये चीजें सजीव हो जाती हैं और इनके दर्शन  होने लगते हैं , अब आप टिप्पणी में बताएं कि ये वस्तुएं जिनकी आपने कल्पना की किस इन्द्रिय के द्वारा दिखाई दिया अवश्य बताएं |  सामान्यतया सभी ज्ञान हमारे मष्तिष्क में इन्द्रियों के माध्यम से पहुंचतें हैं और वहां संग्रहित रहते हैं , संग्रहित मस्तिष्क में  अवश्य रहते हैं किन्तु इनका दिखाई देना कैसे संभव हुआ जबकि देखने के लिए आँखें आवश्यक हैं , किन्तु आपने तो अपनी आँखें बंद कर के कल्पना की है है न मजेदार बात क्या आपका ध्यान कभी इस ओर गया था |
       आज्ञा चक्र अगर क्रियाशील हो तब मान  लें की आकाश में बादल घिरे हें हैं और आप ये कह सकते हैं कि बारिश होगी किन्तु अगर आकाश में बादल मौजूद न हो और आप ये निश्चयपूर्वक  कह दें की थोड़ी देर में बारिश होगी और बारिश हो  जाए इसका मतलब यह हुआ कि आपका आज्ञा चक्र क्रियाशील है | यहाँ मैं वैज्ञानिक आधार पर मौसम की भविष्यवाणी की बात नहीं कर रहा |

       आज्ञा चक्र के जागरण के पश्चात मन की चंचलता समाप्त हो जाती है और बुध्धि शुद्ध हो जाती है  | आसक्ति जो अज्ञान और भेद का कारण है , समाप्त हो जाती है तथा संकल्प शक्ति बहुत बढ़ जाती है | यदि व्यक्तिगत धर्म के अनुसार कोई मानसिक संकल्प हो तो वह पूरा हो जाता है |
       आज्ञा ऐसा केंद्र  है जहाँ व्यक्ति मन तथा शरीर के अंदर घट रही प्रत्येक घटना सहित सभी अनुभवों को द्रष्टा भाव से देखता रहता है | यहाँ व्यक्ति के सजगता का इस तरह से विकास होता है कि उसमे दृश्य जगत के प्रत्येक छिपे हुए रहस्यों को जान सकने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है | जब आज्ञा चक्र का जागरण होने लगता है तब प्रत्येक प्रतीक का अर्थ एवं महत्व समझ में आने लगता है  |
       यह अतीन्द्रिय अनुभूतियों का स्थान है जहाँ व्यक्ति में उसके संस्कार और मानसिक प्रवृतियों के अनुसार अनेकानेक  सिद्धियाँ प्रकट होती है | ऐसा भी कहा जाता है  आज्ञा चक्र रीढ़ की हड्डी के सबसे उपर एक ग्रन्थि के रूप में स्थित है | तन्त्र के अनुसार इस ग्रन्थि को शिव ग्रन्थि कहतें हैं | यह साधक के उन नयी सिद्धियों से लगाव का प्रतीक है जो आज्ञा चक्र के जागरण से प्रकट होती  है | यह ग्रन्थि अध्यात्मिक विकास के मार्ग को तब तक अवरुद्ध रखती है जब तक सिद्धियों के प्रति लगाव समाप्त नहीं हो जाता तथा चेतना के मार्ग की बाधा समाप्त नहीं हो जाती |
       इस भाग के प्रस्तुती के बाद  एक या दो भाग और प्रेषित होंगे उसके बाद आज्ञा चक्र के जागरण हेतु कुछ ध्यान प्रयोग लिखित तथा Mp3  रूप में भी पोस्ट डालूँगा  ब्लॉग पर बने रहें  |

       

Wednesday, 27 May 2015

आज्ञा चक्र - 4

आप प्राय : तस्वीरों में आज्ञा चक्र का स्वरुप देखते होंगे | आज्ञा चक्र का प्रतीक है दो पंखुड़ियों वाला कमल | शास्त्रों के अनुसार इसका रंग पीला हल्का भूरा तथा स्लेटी सा है | कुछ का अनुभव है की यह चन्द्रमा या चांदी जैसा सफ़ेद है परन्तु वस्तुतः इसका रंग दिखाई नहीं देता | एक बात   स्मरण करा दूं रंगों के सम्बन्ध में आप धारणाएं बना कर ध्यान में प्रवेश न करें बल्कि आपकी जो अनुभूति हो वह सर्वोपरी है |
       बायीं पंखुड़ी पर हं तथा दायीं पंखुड़ी पर क्षं अंकित है | हं और क्षं चमकीले सफ़ेद रंग में हैं और ये शिव शक्ति के बीज मन्त्र हैं | एक चन्द्रमा या इडा नाडी का तथा दूसरा सूर्य या पिंगला नाडी का प्रतीक है |इस चक्र के निचे परस्पर तीन नाड़ियाँ  आकर मिलती हैं जिसका वर्णन मैं कर चुका हूँ |
       कमल के अंदर एक पूर्ण  वृत  है जो शून्य का प्रतीक है | वृत के अंदर एक त्रिकोण है जो  शक्ति की रचनात्मकता तथा प्रकटीकरण का प्रतिनिधित्व करता है | त्रिकोण के उपर एक काला शिवलिंगम है | इस लिंग का स्वरुप लैंगिक नहीं है जैसा की सभी सोचते हैं | यह आपके सूक्ष्म शरीर का प्रतीक है | तंत्र और गुह्य शास्त्रों के अनुसार सूक्ष्म शरीर आपके व्यक्तित्व का प्रतीक है |
       मूलाधार में लिंगम ध्रूमवर्णी तथा अस्पस्ट है | इसे ध्रूम लिंगम भी कहा जाता है और इसकी तुलना चेतना के उस स्तर से करते हैं जिस स्तर का हम नैसर्गिक जीवन बिता रहे होते हैं | इस समय हम क्या हैं और कौन हैं इसका ज्ञान नहीं होता है | आज्ञा चक्र में स्थित काले लिंगम को इतराख्या लिंगम कहते है | आज्ञा चक्र में हम क्या हैं इसका स्वरुप बोध होता है | सहस्त्रार में चेतना प्रकाशित रहती है इसलिए आज्ञा चक्र का लिंगम भी प्रकाशित रहती है |
       जब कोई मानसिक रूप से अविकसित व्यक्ति ध्यान करता है तो उसे शिवलिंगम धुंवे की तरह दिखाई देता है |  यह प्रतीक बार बार ध्यान में आता जाता रहता है | गहरे ध्यान में जब मन शांत रहता है तो लिंगम काला दिखाई देता है | इस काले लिंगम पर ध्यान करने से प्रकाशमान सूक्ष्म चेतना में ज्योतिर्लिंगम प्रकट होता है | इसलिए आज्ञा चक्र का काला लिंगम जीवन के उच्च अध्यात्मिक क्षेत्रो की कुंजी है |

       शिवलिंगम के उपर परंपरागत प्रतीक ॐ है | ॐ आज्ञा चक्र का प्रतीक एवं बीज मन्त्र है |  परम शिव आज्ञा चक्र के देवता हैं तथा वे एक प्रकाश की माला की तरह चमकते हैं | देवी है हांकिनी जिनके छ : मुख हैं तथा जो अनेक चन्द्रमा की भाँती दिखाई देती हैं | एक बात याद दिला दूं ये कोरी कल्पनाएँ नहीं हैं बल्कि जब आप ध्यान में प्रवेश करते हैं तो ये हकीकत हो जातीं हैं और इसी तरह का  वास्तविक अनुभव प्राप्त होता है |
       प्रत्येक चक्र की अपनी अपनी तन्मात्राए  , ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ होती हैं | आज्ञा चक्र की तन्मात्राओं ,ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों सभी का रूप मन है | यहाँ मन को सूक्ष्म माध्यमों से ज्ञान व संकेत प्राप्त होते हैं न कि उन इन्द्रियों से जो अन्य चक्रों के लिए ज्ञानेन्द्रिय का कार्य करती है | आज्ञा चक्र के जागरण के पश्चात अंतर्ज्ञानी की छटवीं इन्द्रिय क्रियाशील हो जाती है |  जिससे मन को ज्ञान व दिशा निर्देश मिलता है | ये इन्द्रियां मन की ज्ञानेन्द्रियाँ हैं | इसी तरह मन बिना सूक्ष्म शरीर के अच्छी तरह काम कर सकता है | मन को आज्ञा चक्र का कर्मेन्द्रिय माना जाता है | बिलकुल ध्यान देने योग्य बात आज्ञा चक्र के जागरण का माध्यम एकदम मानसिक है अत: तन्मात्रा भी मन है | इसलिए आप ये नहीं कह सकते की मन आपका शत्रु है बल्कि मन हीं आपका  परम मित्र है जिसके सही प्रयोग से आप परम को पा सकते हैं और परम को पाने के बाद  मन की समाप्ति हो जाती है | विशुधि चक्र के साथ आज्ञा चक्र द्वारा विज्ञानमय कोष का निर्माण होता है जिससे अतीन्द्रिय विकास प्रारम्भ होता है |
       जो इस जागे हुए चक्र पर ध्यान करते हैं उन्हें एक जलता हुआ लैंप उगते हुए सूर्य की भाँती दिखाई देता है | जागे हुए चक्र पर ध्यान करने से परकाया प्रवेश की शक्ति आ जाती है मनुष्य भविष्यद्रष्टा बन जता है | ऐसे व्यक्ति सारे शास्त्रों और पुराणों का ज्ञाता बन जाता है | अलग अलग चक्रों पर ध्यान करने से जो अनुभूतियाँ होती हैं वे सभी अनुभूतियाँ इस चक्र पर ध्यान करने से होती हैं |
       शेष अगले भाग में ................

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