Sunday, 1 November 2015

शाम्भवी मुद्रा

शाम्भवी मुद्रा योगियों के मनोरथ पूर्ण करने वाली मुद्रा है। उन्नत योग साधकों को शाम्भवी मुद्रा स्वतः ही होने लगती है| फिर भी साधकों द्वारा इसका अभ्यास साधना को सुगम बना देता है|
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श्री श्री श्यामाचरण लाहिड़ी महाशय और महावातार बाबाजी के चित्र शाम्भवी मुद्रा में ही हैं|
सारे उन्नत योगी शाम्भवी मुद्रा में ही ध्यानस्थ रहते हैं|
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सुखासन अथवा पद्मासन में बैठकर मेरुदंड को उन्नत रखते हुए साधक शिवनेत्र होकर अर्धोन्मीलित नेत्रों से भ्रूमध्य पर दृष्टी स्थिर रखता है| धीरे धीरे पूर्ण खेचरी या अर्ध-खेचरी भी स्वतः ही लग जाती है|

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आध्यात्मिक रूप से खेचरी का अर्थ है --- चेतना का सम्पूर्ण आकाश में विचरण, यानि चेतना का इस भौतिक देह में न होकर पूरी अनंतता में होना है | भौतिक रूप से खेचरी का अर्थ है -- जिह्वा को उलट कर भीतर प्रवेश कराकर ऊपर की ओर रखना| गहरी समाधि के लिए यह आवश्यक है| जो पूर्ण खेचरी नहीं कर सकते वे अर्धखेचरी कर सकते हैं जीभ को ऊपर पीछे की ओर मोडकर तालू से सटाकर रखते हुए|


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अर्धोन्मीलित नेत्रों को भ्रूमध्य में स्थिर रखकर साधक पहिले तो भ्रूमध्य में एक प्रकाश की कल्पना करता है और यह भाव करता है कि वह प्रकाश सम्पूर्ण ब्रह्मांड में फ़ैल गया है| फिर संहार बीज और सृष्टि बीज --- 'हं" 'सः' के साथ गुरु प्रदत्त विधि के साथ अजपा जप करता है और उस सर्वव्यापक ज्योति के साथ स्वयं को एकाकार करता है | समय आने पर गुरुकृपा से विद्युत् की चमक के समान देदीप्यमान ब्रह्मज्योति ध्यान में प्रकट होती है| उस ब्रह्मज्योति पर ध्यान करते करते प्रणव की ध्वनि सुनने लगती है तब साधक उसी में लय हो जाता है| सहत्रार की अनुभूति होने लगती है और बड़े दिव्य अनुभव होते हैं| पर साधक उन अनुभवों पर ध्यान न देकर पूर्ण भक्ति के साथ ज्योति ओर नाद रूप में परमात्मा में ही अपने अहं को विलय कर देता है| तब सारी प्राण चेतना आज्ञाचक्र और सहस्त्रार के मध्य स्थिर हो जाती है| यही शाम्भवी मुद्रा की पूर्ण सिद्धि है

इस बेहतरीन पुस्तक को अवश्य पढ़ें ( English ) हिंदी में                                                                                                                                          
नोट  : बिना  योग्य  निर्देशन के खेचरी मुद्रा  करना  वर्जित  है | लेख में स्वत : खेचरी मुद्रा  लगने का वर्णन  है अगर  ऐसा  स्वत : हो  जाए  तो  कोई  बात  नहीं  |
तस्वीर में शाम्भवी तथा अघोरी  मुद्रा में अंतर दिखाया गया है शाम्भवी मुद्रा में आँख उपर की ओर भ्रूमध्य के तरफ और अघोरी मुद्रा में आँखें निचे की ओर नासिकाग्र के तरफ या निचे |

ॐ 

Friday, 17 July 2015

समय गतिशील नहीं बल्कि स्थिर है

आमतौर पर धारणा है कि समय परिवर्तनशील है समय चलयमान , समय गतिशील है ! लीजिये आज मैं आपके इस धारणा का खंडन करता हूँ | यह पूर्णत :गलत है कि समय गतिशील है , बल्कि सच्चाई यह है कि समय बिलकुल स्थिर है | कैसे ? हम समय को कैसे परिभाषित करते हैं मिनट दिन साल आदि से , हम कहते हैं अभी सुबह हुआ है अभी शाम हुआ है , कल बीत गया या कल आने वाला है | या कहते हैं वर्षों बीत गए | या फिर कहते हैं आज सब बदल गया है समय बदल गया है |

दरअसल समय का निर्धारण सूर्य और पृथ्वी की गति से करते हैं , तो क्या इस दरम्यान सचमुच समय गतिशील रहता नहीं बिलकुल नहीं बल्कि सच्चाई यह है कि पृथ्वी गतिशील होती है और उसी के गति के आधार पर हम समय का निर्धारण करते हैं , समय तो स्थिर होता है | क्या पृथ्वी की गति हीं समय है नहीं यह भी सत्य नहीं है पृथ्वी की गति वृताकार है , सुबह होता है , दोपहर फिर शाम , रात्री तथा फिर सुबह इस प्रकार सर्किल चलता रहता है |
हम कहते हैं आज हम जवान हैं कल बच्चे थे और कल बूढ़े हो जायेंगे समय एक समान नहीं है | भाई ये परिवर्तन समय का नहीं बल्कि आपके भीतर का है शारीरिक परिवर्तन | हम कहते हैं कल जो गरीब था आज करोडपति अमीर है फलां का समय बदल गया नहीं नहीं फलां का समय नहीं बल्कि आर्थिक स्थिति बदल गयी |
अब सवाल यह है कि समय क्या है तो जबाब है .....
समय परमात्मा है जो स्थिर है समय आपके भीतर की आत्मा है |
ये विचार मेरी आत्मानुभूति है इस पर अपने विचार अवश्य दें |